जय श्री महाकाल! जय श्री काल भैरव!
मध्य प्रदेश की मोक्षदायिनी नगरी उज्जैन, जिसे तीनों लोकों में न्यारी अवंतिका कहा जाता है, भगवान शिव के चमत्कारों और उनकी अनंत लीलाओं का सबसे बड़ा केंद्र है। इस महाकाल वन में ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर के दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माने जाते, जब तक भक्त इस नगर के सेनापति और रक्षक—श्री काल भैरव (Kaal Bhairav) के दरबार में हाजिरी न लगा ले।
काल भैरव मंदिर अपनी उस अद्भुत और अकल्पनीय परंपरा के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है जहाँ भगवान साक्षात मदिरा (शराब) का पान करते हैं। वैसे तो इस मंदिर में साल के 365 दिन भक्तों का भारी तांता लगा रहता है, लेकिन हिन्दू पंचांग की दो विशेष तिथियों—‘कालाष्टमी’ (Kalashtami) और ‘भैरव अष्टमी’ (Bhairav Ashtami) के दिन इस मंदिर का वातावरण, यहाँ की ऊर्जा और यहाँ होने वाले तांत्रिक अनुष्ठान अपने चरम पर होते हैं।
इस विशेष और विस्तृत लेख में हम गहराई से जानेंगे कि आखिर उज्जैन के काल भैरव मंदिर में कालाष्टमी और भैरव अष्टमी का इतना अधिक धार्मिक और तांत्रिक महत्व क्यों है। साथ ही, हम इन पावन तिथियों पर मंदिर में होने वाले विशेष आयोजनों, महा-आरती और पूजा विधि पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।
कालाष्टमी और भैरव अष्टमी में क्या अंतर है? (Difference Between Kalashtami and Bhairav Ashtami)
अक्सर कई श्रद्धालु कालाष्टमी और भैरव अष्टमी को एक ही मान लेते हैं, लेकिन शास्त्रों और उज्जैन की तांत्रिक परंपरा के अनुसार इन दोनों में एक सूक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण अंतर है:
1. कालाष्टमी (Kalashtami)
हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (8वें दिन) को ‘कालाष्टमी’ या ‘भैरवाष्टमी’ कहा जाता है। चूँकि एक वर्ष में 12 महीने होते हैं, इसलिए वर्ष में कुल 12 कालाष्टमी तिथियां आती हैं। कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) की यह तिथि भगवान काल भैरव को अत्यंत प्रिय है। हर महीने आने वाली इस तिथि पर भैरव भक्त व्रत रखते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
2. भैरव अष्टमी या काल भैरव जयंती (Bhairav Ashtami / Kaal Bhairav Jayanti)
मार्गशीर्ष (अगहन) महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘काल भैरव जयंती’ या मुख्य ‘भैरव अष्टमी’ के रूप में मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार, इसी विशेष दिन भगवान शिव के अंश से रूद्र रूप ‘काल भैरव’ का अवतरण (जन्म) हुआ था। यह साल का सबसे बड़ा दिन होता है जब काल भैरव मंदिर उज्जैन में एक भव्य मेले और महा-उत्सव का आयोजन किया जाता है।
कालाष्टमी का तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व (Significance of Kalashtami)
उज्जैन प्राचीन काल से ही तांत्रिकों, कापालिकों और अघोरियों की सबसे बड़ी सिद्ध पीठ रही है। कालाष्टमी की रात को तंत्र शास्त्र में ‘महारात्रि’ के समान माना गया है।
1. नकारात्मक शक्तियों का नाश: काल भैरव को भगवान शिव का उग्र रूप माना जाता है, जो मृत्यु और भय के स्वामी हैं। कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि अंधकार की ओर बढ़ती है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, इस रात नकारात्मक शक्तियां सक्रिय होती हैं। भगवान काल भैरव की कालाष्टमी पर पूजा करने से जीवन के सभी प्रकार के भय, भूत-प्रेत की बाधा, ऊपरी हवा और काले जादू (Black Magic) का पूर्णतः नाश हो जाता है।
2. शत्रुओं पर विजय: यदि कोई व्यक्ति बेवजह कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में फंसा है या उसके गुप्त शत्रु उसे परेशान कर रहे हैं, तो उज्जैन में कालाष्टमी के दिन भैरव जी को मदिरा और तेल का दीपक अर्पित करने से शत्रुओं का शमन (नाश) होता है और मुकदमों में विजय प्राप्त होती है।
3. पापों से मुक्ति: मान्यता है कि कालाष्टमी का व्रत रखने और उज्जैन के काल भैरव मंदिर में दर्शन करने से व्यक्ति द्वारा जाने-अनजाने में किए गए बड़े से बड़े पाप (यहाँ तक कि ब्रह्महत्या जैसा पाप भी) कट जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वयं काल भैरव ब्रह्महत्या के पाप से उज्जैन आकर मुक्त हुए थे।
भैरव अष्टमी (काल भैरव जयंती): उज्जैन का महा-उत्सव (The Great Festival of Kaal Bhairav Jayanti)
मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी यानी ‘काल भैरव जयंती’ उज्जैन शहर के लिए किसी दीवाली से कम नहीं होती। इस दिन मंदिर का नजारा देखने लायक होता है। आइए जानते हैं इस दिन का पौराणिक महत्व और मंदिर में होने वाले आयोजनों की भव्यता।
पौराणिक कथा: जब कटा ब्रह्मा जी का पांचवां सिर
शिव पुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। ब्रह्मा जी के उस समय पांच मुख हुआ करते थे। अहंकार के मद में चूर होकर ब्रह्मा जी के पांचवें मुख ने भगवान शिव का घोर अपमान कर दिया।
शिव जी के क्रोध की कोई सीमा न रही और उनके उसी असीम क्रोध से महाकाल वन (उज्जैन) की रक्षा के लिए ‘काल भैरव’ की उत्पत्ति हुई। यह दिन मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी का ही था। उत्पन्न होते ही काल भैरव ने अपने त्रिशूल से ब्रह्मा जी के उस अहंकारी पांचवें सिर को धड़ से अलग कर दिया। इसी घटना की याद में और भगवान के अवतरण की खुशी में भैरव अष्टमी का महापर्व मनाया जाता है।
काल भैरव मंदिर, उज्जैन में होने वाले विशेष आयोजन और अनुष्ठान (Special Rituals and Events)
कालाष्टमी और विशेषकर काल भैरव जयंती के दिन उज्जैन के इस मंदिर में ऐसे अनुष्ठान होते हैं, जिन्हें देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और सिद्ध साधु-संत यहाँ पहुँचते हैं।
1. भस्म, सिंदूर और चांदी का चोला (Special Shringar)
आम दिनों में भगवान काल भैरव का श्रृंगार सिंदूर से होता है, लेकिन भैरव अष्टमी और कालाष्टमी की मध्यरात्रि में भगवान का एक अद्भुत और अलौकिक श्रृंगार किया जाता है।
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पुजारी भगवान की पाषाण प्रतिमा पर सिंदूर (चोला), चमेली का तेल, चांदी के वर्क (Silver Foil) और विभिन्न सुगन्धित इत्र का लेपन करते हैं।
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भैरव जी को लाल और काले रंग के भव्य वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनके मस्तक पर मुकुट धारण कराया जाता है।
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गले में नींबू और गुलाब के फूलों की विशाल मालाएं पहनाई जाती हैं, जो उनके उग्र स्वरूप को और भी तेजोमय बना देती हैं।
2. छप्पन भोग और महा-मदिरा अर्पण (Huge Liquor & Food Offering)
इस दिन भगवान को केवल सामान्य मदिरा ही नहीं, बल्कि ‘छप्पन भोग’ (56 प्रकार के व्यंजन) अर्पित किए जाते हैं।
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मदिरा का अंबार: भैरव अष्टमी के दिन देश भर से भक्त ट्रकों और पेटियों में भरकर देसी और विदेशी मदिरा (शराब) भगवान को अर्पित करने के लिए लाते हैं। पुजारियों द्वारा निरंतर मदिरा का भोग भगवान की मूर्ति को लगाया जाता है और मूर्ति उस मदिरा को चमत्कारिक रूप से सोखती जाती है।
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अन्य भोग: मदिरा के साथ-साथ भगवान को उड़द की दाल के बड़े, इमरती, मालपुआ, काले तिल की मिठाई और नारियल का विशेष भोग लगाया जाता है।
3. मध्यरात्रि की तांत्रिक महा-आरती (Midnight Maha Aarti)
भैरव अष्टमी और कालाष्टमी की रात 12 बजे (मध्यरात्रि) मंदिर का दृश्य सबसे अधिक रोमांचकारी होता है।
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ठीक रात 12 बजे मंदिर के प्रांगण में विशाल डमरू, नगाड़े, ढोल और शंख एक साथ बजने लगते हैं।
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कपूर की विशाल आरती प्रज्वलित की जाती है और पूरा मंदिर ‘जय काल भैरव’ के जयकारों से गूंज उठता है। यह आरती इतनी उग्र और शक्तिशाली होती है कि इसे देखकर कमजोर दिल वाले लोग भी शिव भक्ति के उत्साह से भर जाते हैं।
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इस आरती में शामिल होना जीवन के सबसे बड़े पुण्यों में से एक माना गया है।
4. बटुक भैरव और श्वान पूजा (Worship of Vahana)
काल भैरव का वाहन ‘श्वान’ (कुत्ता) है। इन विशेष दिनों में मंदिर परिसर और उज्जैन शहर के काले कुत्तों की विशेष सेवा की जाती है। भक्त उन्हें दूध, जलेबी, मीठी रोटियां और बिस्किट खिलाते हैं। मान्यता है कि वाहन को प्रसन्न किए बिना भगवान भैरव प्रसन्न नहीं होते।
5. भगवान की शाही सवारी (Nagar Bhraman)
भैरव अष्टमी के मुख्य दिन भगवान काल भैरव की एक भव्य पालकी (सवारी) निकाली जाती है। उज्जैन के सेनापति अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस सवारी में पुलिस बैंड, अखाड़े के साधु, घुड़सवार और हजारों भक्त शामिल होते हैं। यह पालकी क्षिप्रा नदी के तट तक जाती है।
कालाष्टमी और भैरव अष्टमी पर घर बैठे कैसे करें पूजा? (How to Worship at Home)
यदि आप इन विशेष तिथियों पर उज्जैन के काल भैरव मंदिर में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, तो आप अपने घर पर ही भगवान का ध्यान करते हुए इस विधि से पूजा कर सकते हैं:
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व्रत का संकल्प: कालाष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। काले या नीले रंग के वस्त्र धारण करें और दिन भर व्रत रखने का संकल्प लें।
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मूर्ति या चित्र की स्थापना: घर के मंदिर में भगवान शिव या भैरव जी (यदि चित्र हो) की पूजा करें। एक लकड़ी की चौकी पर काला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान को स्थापित करें।
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सरसों के तेल का दीपक: काल भैरव को सरसों का तेल अत्यंत प्रिय है। गोधूलि बेला (शाम के समय) या रात के समय भगवान के सामने सरसों के तेल का एक चौमुखी दीपक (चार बत्तियों वाला) प्रज्वलित करें।
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भोग अर्पण: घर में मदिरा का भोग लगाना आवश्यक नहीं है। आप जलेबी, उड़द की दाल के पकौड़े (बड़े), इमरती या मीठी रोटी का भोग लगा सकते हैं।
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मंत्र जाप: रुद्राक्ष की माला से भगवान काल भैरव के महामंत्र “ॐ काल भैरवाय नम:” या “ॐ ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा” का 108 बार (एक माला) जाप करें।
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भैरव चालीसा: ‘श्री भैरव चालीसा’ या ‘भैरवाष्टकम’ का पाठ करना इस दिन बहुत शीघ्र फल देता है।
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कुत्तों को भोजन: पूजा समाप्त होने के बाद गली के किसी भी काले कुत्ते (या जो भी कुत्ता मिल जाए) को मीठी रोटी या दूध अवश्य पिलाएं। इससे आपकी पूजा सीधे भगवान तक पहुँच जाएगी।
ज्योतिषीय लाभ: कालाष्टमी की पूजा से किन दोषों का होता है निवारण? (Astrological Benefits)
उज्जैन की सिद्ध भूमि पर या इस दिन घर पर की गई काल भैरव की पूजा ज्योतिषीय दृष्टि से कई भयंकर दोषों का रामबाण इलाज है:
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राहु और केतु की शांति: ज्योतिष में राहु और केतु को मायावी और छाया ग्रह माना गया है। जिन जातकों की कुंडली में राहु-केतु अशांत हैं या महादशा चल रही है, उन्हें कालाष्टमी के दिन उज्जैन आकर दर्शन करने से तुरंत राहत मिलती है। राहु और केतु काल भैरव के ही नियंत्रण में हैं।
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कालसर्प दोष (Kaal Sarp Dosh): उज्जैन कालसर्प दोष पूजा का केंद्र है। भैरव अष्टमी पर किए गए दर्शन से कालसर्प दोष की भयंकर पीड़ा और उससे जीवन में आ रही रुकावटें दूर हो जाती हैं।
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शनि की साढ़ेसाती और ढैया: भगवान शनिदेव भी काल भैरव का आदर करते हैं। शनि के प्रकोप, साढ़ेसाती या ढैया से पीड़ित लोगों के लिए सरसों के तेल का दीपक और काले तिल भैरव जी को अर्पित करना शनि के दंड को शांत कर देता है।
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बीमारी और अकाल मृत्यु: जो लोग लगातार गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं या जिन्हें अकाल मृत्यु का भय सताता है, भैरव जी के आशीर्वाद से उन्हें आरोग्य (अच्छा स्वास्थ्य) और दीर्घायु प्राप्त होती है।
उज्जैन यात्रा: दर्शनार्थियों के लिए महत्वपूर्ण टिप्स (Tips for Devotees Visiting Ujjain)
यदि आप कालाष्टमी या भैरव अष्टमी (मार्गशीर्ष मास) पर उज्जैन आ रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:
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भारी भीड़ के लिए रहें तैयार: काल भैरव जयंती के दिन उज्जैन में लाखों की भीड़ होती है। दर्शन लाइन में 4 से 6 घंटे तक का समय लग सकता है। इसलिए धैर्य बनाए रखें और भगवान के जयकारे लगाते रहें।
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वीआईपी (VIP) दर्शन टिकट: प्रशासन द्वारा भीड़ को देखते हुए शीघ्र दर्शन के लिए सशुल्क (Paid) पास की व्यवस्था की जाती है। समय बचाने के लिए आप मंदिर के बाहर बने काउंटर से यह रसीद कटवा सकते हैं।
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सुरक्षा और सावधानी: मंदिर में भारी भीड़ और आरती के समय होने वाले शोरगुल के कारण छोटे बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। अपने कीमती सामान (पर्स, मोबाइल) की सुरक्षा स्वयं करें।
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दलालों से दूर रहें: प्रसाद और मदिरा केवल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त दुकानों से ही खरीदें। किसी भी अनधिकृत व्यक्ति से पूजा कराने या विशेष दर्शन कराने के झांसे में न आएं।
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गंडा (रक्षा सूत्र): मंदिर से निकलते समय पुजारी से सिद्ध किया हुआ ‘काला धागा’ (गंडा) अवश्य लें और उसे अपने दाहिने हाथ (पुरुष) या बाएं हाथ (महिलाएं) की कलाई पर बांध लें। यह धागा साक्षात काल भैरव का रक्षा कवच होता है।
उज्जैन का ‘श्री काल भैरव मंदिर’ तंत्र, आस्था और शिव भक्ति का एक ऐसा अनूठा संगम है, जहाँ आकर विज्ञान भी नतमस्तक हो जाता है। कालाष्टमी और भैरव अष्टमी की पावन तिथियां इस बात का स्मरण कराती हैं कि जब संसार में अहंकार, अज्ञानता और नकारात्मक शक्तियों का अंधकार बढ़ता है, तो शिव का रौद्र रूप ‘काल भैरव’ उसे नष्ट करने के लिए अवतरित होता है।
हर महीने आने वाली कालाष्टमी हमें अपने भीतर के अहंकार और बुराइयों को मदिरा के रूप में भगवान को सौंपने का अवसर देती है। वहीं, वर्ष में एक बार आने वाली ‘भैरव अष्टमी’ भगवान के उस विराट स्वरूप का उत्सव है जो उज्जैन नगरी का रक्षक और सेनापति है।
यदि आप जीवन की परेशानियों, कोर्ट-कचहरी, बीमारियों या अनजाने भय से त्रस्त हैं, तो एक बार कालाष्टमी या भैरव अष्टमी के दिन महाकाल के इस सेनापति के दरबार में हाजिरी जरूर लगाएं। सच्चे मन से चढ़ाई गई मदिरा की एक बूंद और सरसों के तेल का एक दीपक आपके जीवन के सभी संकटों को भस्म कर देगा।
जय श्री काल भैरव! जय श्री महाकाल!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: कालाष्टमी महीने में कब आती है?
उत्तर: हिन्दू पंचांग के अनुसार, कालाष्टमी हर महीने के कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) की अष्टमी तिथि (आठवें दिन) को मनाई जाती है। यह भगवान काल भैरव को समर्पित होती है।
प्रश्न 2: क्या कालाष्टमी और भैरव अष्टमी (जयंती) एक ही हैं?
उत्तर: तिथि के अनुसार दोनों कृष्ण पक्ष की अष्टमी हैं। लेकिन हर महीने आने वाली तिथि ‘कालाष्टमी’ कहलाती है, जबकि साल में एक बार मार्गशीर्ष (अगहन) महीने में आने वाली मुख्य अष्टमी को भगवान का जन्मदिवस माना जाता है और इसे ‘काल भैरव जयंती’ या ‘भैरव अष्टमी’ कहते हैं।
प्रश्न 3: कालाष्टमी के दिन काल भैरव मंदिर, उज्जैन में क्या विशेष होता है?
उत्तर: इस दिन मंदिर में भगवान का भव्य सिंदूर और चांदी के वर्क से श्रृंगार होता है। मध्यरात्रि 12 बजे डमरू और नगाड़ों के साथ विशेष तांत्रिक महा-आरती होती है और भगवान को मदिरा तथा छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं।
प्रश्न 4: घर पर कालाष्टमी का व्रत कैसे खोलें?
उत्तर: कालाष्टमी का व्रत शाम को भगवान काल भैरव की पूजा, आरती और सरसों के तेल का दीपक जलाने के बाद खोला जाता है। व्रत खोलने से पहले किसी काले कुत्ते को मीठी रोटी या दूध अवश्य पिलाना चाहिए।
प्रश्न 5: क्या महिलाएं कालाष्टमी की पूजा और व्रत कर सकती हैं?
उत्तर: जी हाँ, बिल्कुल। महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा भाव से कालाष्टमी का व्रत रख सकती हैं और भगवान काल भैरव की पूजा कर सकती हैं। शिव और भैरव की दृष्टि में सभी भक्त समान हैं। बस पूजा के दौरान सात्विकता और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।