मध्य प्रदेश की पावन, मोक्षदायिनी और अत्यंत प्राचीन नगरी उज्जैन (अवंतिका) को तंत्र साधना, शक्ति उपासना और शिव भक्ति का सबसे जाग्रत केंद्र माना जाता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ‘श्री महाकालेश्वर’ की इस नगरी में कदम-कदम पर ऐसे पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, जिनकी महिमा सुनकर आधुनिक विज्ञान भी चकित रह जाता है। उज्जैन की इसी पावन धरा पर, महाकाल मंदिर के प्रवेश मार्ग के समीप स्थित है एक अत्यंत चमत्कारी, ऐतिहासिक और रहस्यमयी मंदिर—श्री चौबीस खंभा माता मंदिर (Shri Chaubis Khamba Mata Temple)।
चौबीस खंभा माता मंदिर केवल साधारण पूजा-पाठ का केंद्र नहीं है, बल्कि यह उज्जैन के प्राचीन गौरवशाली इतिहास, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की तंत्र साधना और गुप्त राजवंश के कालखंड का एक जीवंत साक्ष्य है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और विस्मयकारी विशेषता यह है कि यहाँ शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर होने वाली ‘शासकीय महापूजा’ में देवी माँ को मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है और पूरे उज्जैन नगर की सुरक्षा के लिए लगभग 27 किलोमीटर लंबी ‘नगर पूजा’ (मदिरा की धार गिराने की परंपरा) यहीं से शुरू होती है।
वर्तमान वर्ष 2026 में, जहाँ उज्जैन ‘महाकाल महालोक’ कॉरिडोर के कारण वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक पर्यटन का सबसे बड़ा हब बन चुका है, इस ऐतिहासिक मंदिर के दर्शनार्थियों की संख्या में भी अपार वृद्धि हुई है।
इस अत्यंत विस्तृत, प्रामाणिक और संपूर्ण मार्गदर्शिका (Complete Guide) में हम चौबीस खंभा माता मंदिर के प्राचीन इतिहास, चौबीस खंभों का स्थापत्य रहस्य, महालाया और महामाया देवियों की पौराणिक कथा, सम्राट विक्रमादित्य से इसका गहरा संबंध, नवरात्रि महापूजा व मदिरा भोग का विधान, दर्शन के समय और आपकी उज्जैन यात्रा को सुगम बनाने वाली हर आवश्यक जानकारी पर गहराई से चर्चा करेंगे।
1. चौबीस खंभा माता मंदिर क्या है और यह नाम कैसे पड़ा? (The Concept)
चौबीस खंभा माता मंदिर उज्जैन के महाकाल चौराहे से थोड़ा आगे, गुदरी बाजार और पटनी बाजार के मार्ग पर स्थित है। वास्तव में, यह स्थान प्राचीन अवंतिका नगरी का मुख्य प्रवेश द्वार (Grand Entrance Gate) हुआ करता था।
‘चौबीस खंभा’ नाम का रहस्य (Why 24 Pillars?)
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यह मंदिर प्राचीन पत्थरों से बने चौबीस (24) अत्यंत भव्य और विशाल खंभों (Pillars) पर टिका हुआ है। इसी स्थापत्य (Architecture) विशेषता के कारण लोक भाषा में इसे ‘चौबीस खंभा मंदिर’ कहा जाने लगा।
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पुरातत्वविदों के अनुसार, ये खंभे साधारण नहीं हैं; ये प्राचीन परमार कालीन और गुप्त कालीन वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण हैं, जिन पर बारीक नक्काशी, देवी-देवताओं की आकृतियां और पौराणिक चिह्न उकेरे गए हैं।
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प्राचीन काल में राजा-महाराजा जब भी उज्जैन नगरी की सीमा में प्रवेश करते थे, तो वे सबसे पहले इसी द्वार पर रुकते थे और नगर की रक्षक देवियों का आशीर्वाद लेकर ही अंदर कदम रखते थे।
गर्भगृह में विराजमान दो देवियाँ: महालाया और महामाया
इस मंदिर के मुख्य गर्भगृह में दो प्राचीन और अत्यंत तेजोमय देवियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं:
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माता महालाया (Matalaya / Mahalaya): इन्हें स्थानीय लोग ‘चौबीस खंभा माता’ भी कहते हैं। ये सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्रदाता हैं।
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माता महामाया (Mahamaya): ये भ्रांतियों और अज्ञानता का नाश करने वाली माया स्वरूपा देवी हैं।
इन दोनों देवियों को उज्जैन नगरी की ‘द्वारपाल’ या ‘रक्षक देवियाँ’ माना जाता है। मान्यता है कि जब तक इन दोनों देवियों की अनुमति न हो, कोई भी बुरी शक्ति या महामारी उज्जैन नगर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकती।
2. प्राचीन इतिहास और सम्राट विक्रमादित्य से गहरा संबंध (Historical Background)
चौबीस खंभा माता मंदिर का इतिहास सीधा उज्जैन के सबसे प्रतापी, न्यायप्रिय और चक्रवर्ती राजा सम्राट विक्रमादित्य (Emperor Vikramaditya) से जुड़ा हुआ है। विक्रमादित्य न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि वे तंत्र शास्त्र, अघोर साधना और वीर साधना के सर्वोच्च ज्ञाता थे।
नगर रक्षा का दिव्य विधान
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जैन (अवंतिका) को अपनी राजधानी बनाने के बाद नगर की चौतरफा सुरक्षा के लिए एक अभेद्य आध्यात्मिक कवच तैयार किया था। उन्होंने उज्जैन के चारों कोनों और मुख्य प्रवेश द्वारों पर जाग्रत देवियों (शक्तियों) और भैरवों की स्थापना की थी।
इसी क्रम में, विक्रमादित्य ने उज्जैन के इस मुख्य प्रवेश द्वार पर माता महालाया और माता महामाया की स्थापना की। राजा विक्रमादित्य प्रतिदिन अपनी सुबह की शुरुआत इन देवियों की पूजा और आरती से करते थे। माना जाता है कि राजा विक्रमादित्य ने यहाँ घोर तांत्रिक साधनाएं की थीं, जिसके बल पर उन्हें माता ने उज्जैन की अखंड सुरक्षा का वरदान दिया था।
ऐतिहासिक कालखंड और पुनर्निर्माण
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गुप्त और परमार काल: पुरातत्व विभाग के अनुसार, मंदिर के मूल खंभे और आधारशिला चौथी से पांचवीं शताब्दी (गुप्त काल) और बाद में 10वीं-11वीं शताब्दी (परमार काल) की हैं।
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मराठा साम्राज्य का योगदान: मध्यकाल में बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा जब उज्जैन के प्राचीन द्वारों और मंदिरों को क्षतिग्रस्त किया गया, तो 18वीं शताब्दी में मराठा शासकों (सिंधिया राजवंश) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उन्होंने देवियों की प्रतिमाओं को पुनः सुरक्षित गर्भगृह में स्थापित किया और मंदिर के ऊपरी हिस्से को मराठा वास्तुकला के अनुरूप सुधारा।
3. नवरात्रि की महापूजा और शासकीय मदिरा भोग का रहस्य (The Ancient Liquor Ritual)
चौबीस खंभा माता मंदिर की ख्याति पूरे विश्व में केवल इसके प्राचीन खंभों के कारण नहीं है, बल्कि यहाँ शारदीय नवरात्रि (Ashwin Navratri) के दौरान होने वाले एक अत्यंत विस्मयकारी और अनोखे तांत्रिक अनुष्ठान के कारण है। इस अनुष्ठान को ‘शासकीय महापूजा’ या ‘नगर पूजा’ कहा जाता है।
क्यों चढ़ाई जाती है माता को मदिरा? (Tantric Significance)
शास्त्रों के अनुसार, माता दुर्गा के तामसिक और उग्र स्वरूपों (जैसे महाकाली, भद्रकाली, भैरवी) की साधना में मदिरा (मद्य) का भोग लगाने की प्राचीन तांत्रिक परंपरा है। चौबीस खंभा माता मंदिर प्राचीन काल से ही वामाचार तंत्र का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ मदिरा चढ़ाने का अर्थ नशे को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि यह जातक के भीतर की तामसिक प्रवृत्तियों, वासना और अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित करने का एक प्रतीक है।
महाअष्टमी की शासकीय महापूजा का पूरा विधान (The Process)
शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी तिथि पर उज्जैन कलेक्टरेट (प्रशासन) और राजघराने की ओर से यहाँ एक सरकारी पूजा संपन्न की जाती है। इस परंपरा की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने की थी, जिसे बाद में मराठा राजाओं ने निभाया और आज भारत की आधुनिक सरकार (प्रशासन) भी इस प्राचीन परंपरा का अक्षरशः निर्वहन करती है।
[चौबीस खंभा माता मंदिर] ---> (महाअष्टमी की मध्यरात्रि को शासकीय महापूजा और मदिरा अर्पण)
[27 किलोमीटर लंबी नगर पूजा] ---> (तांबे के घड़े से पूरे उज्जैन की सीमा पर मदिरा की धार गिराना)
[हांडी मिलन / समापन] ---> (गढ़कालिका और भूखी माता मंदिर होते हुए २४ घंटे बाद पूर्णाहुति)
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कलेक्टर करते हैं पूजा: महाअष्टमी की सुबह या मध्यरात्रि को उज्जैन के जिला कलेक्टर (District Collector) या प्रशासनिक अधिकारी स्वयं मंदिर पहुँचते हैं। वे पूरे विधि-विधान से माता महालाया और माता महामाया का पूजन, अभिषेक और आरती करते हैं।
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मदिरा का भोग: पूजा के मुख्य भाग में, सरकारी खजाने (प्रशासन) की ओर से लाई गई शुद्ध मदिरा को एक विशेष पात्र में लेकर दोनों देवियों की मूर्तियों को अर्पित किया जाता है।
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27 किलोमीटर लंबी ‘नगर पूजा’ की शुरुआत: चौबीस खंभा माता मंदिर में पूजा संपन्न होने के बाद, मंदिर के कोटवार और कोटवारिन (पारंपरिक सेवक) एक बड़े तांबे के घड़े में मदिरा भरते हैं। इस घड़े के नीचे एक छोटा सा छिद्र (Hole) होता है, जिससे मदिरा की धार लगातार नीचे गिरती रहती है।
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पूरे उज्जैन की परिक्रमा: कोटवार इस मदिरा के घड़े को लेकर, ढोल-नगाड़ों और ‘भैरव महाराज की जय’ के उद्घोष के साथ पैदल चलना शुरू करते हैं। वे पूरे उज्जैन शहर की बाहरी परिधि (Border) पर लगभग 27 किलोमीटर पैदल चलते हैं और पूरी सीमा पर मदिरा की अटूट धार गिराते जाते हैं।
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रास्ते के मंदिरों में पूजा: इस 27 किलोमीटर की यात्रा के दौरान रास्ते में जितने भी भैरव मंदिर, देवी मंदिर और हनुमान मंदिर आते हैं (लगभग 40 से अधिक जाग्रत स्थान), उन सभी स्थानों पर मदिरा, पूड़ी, भजिए और चने का भोग लगाया जाता है।
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24 घंटे बाद समापन: यह नगर पूजा अगले दिन नवमी तिथि को ‘गढ़कालिका मंदिर’ और ‘भूखी माता मंदिर’ होते हुए समाप्त होती है। मान्यता है कि इस नगर पूजा से प्रसन्न होकर देवियाँ और भैरव पूरे वर्ष उज्जैन नगरी को महामारी, अकाल मृत्यु, दुर्घटनाओं और संकटों से बचाकर रखते हैं।
4. चौबीस खंभा माता मंदिर: दर्शन और आरती का समय (Darshan & Aarti Timings)
यदि आप वर्ष 2026 में बाबा महाकाल के दर्शनों के साथ-साथ चौबीस खंभा माता मंदिर के दर्शन की योजना बना रहे हैं, तो मंदिर की समय सारणी नोट करना अत्यंत आवश्यक है:
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मंदिर खुलने का समय: प्रातः 05:00 बजे
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मंदिर बंद होने का समय: रात्रि 10:00 बजे
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यह मंदिर दोपहर में बंद नहीं होता है, श्रद्धालु दिन भर आकर चौबीस खंभों के स्थापत्य और माता के दर्शनों का लाभ उठा सकते हैं।
प्रतिदिन आरती की समय सारणी (Aarti Schedule)
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मंगला आरती (प्रातः काल): सुबह 06:00 बजे से 06:30 बजे के बीच। (इस समय माता का दिव्य श्रृंगार किया जाता है)।
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राजभोग आरती (दोपहर): दोपहर 12:00 बजे। (माता को सात्विक नैवेद्य, फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है)।
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संध्या आरती (Evening Aarti): शाम 07:00 बजे से 07:45 बजे के बीच (सूर्यास्त के समय)। शाम के समय मंदिर प्रांगण दीपकों की रोशनी से जगमगा उठता है और शंख व डमरू की ध्वनि वातावरण को अत्यंत जाग्रत बना देती है।
(विशेष नोट: चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मंदिर चौबीसों घंटे खुला रहता है और यहाँ निरंतर भजन-कीर्तन व अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है)।
5. ज्योतिषीय और आध्यात्मिक लाभ: यहाँ दर्शन क्यों करने चाहिए? (Benefits)
वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के अनुसार, चौबीस खंभा माता मंदिर के दर्शन मात्र से जीवन के कई गंभीर कष्टों का तुरंत निवारण हो जाता है:
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राहु और केतु दोष से मुक्ति: चूंकि यह एक प्राचीन तांत्रिक पीठ है, जिन जातकों की कुंडली में राहु या केतु की महादशा, अंतर्दशा चल रही हो या भयंकर कालसर्प दोष हो, उन्हें यहाँ आकर माता को लाल फूल और नारियल अर्पित करने से राहु-केतु के अशुभ प्रभाव शांत हो जाते हैं।
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ऊपरी हवा और नकारात्मक ऊर्जा का नाश: यदि किसी व्यक्ति पर बुरी नजर (Evil Eye), तंत्र-मंत्र, या किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का साया हो, तो चौबीस खंभा माता के दर्शन करने से वह दोष तुरंत समाप्त हो जाता है। मंदिर के पुजारी भक्तों की रक्षा के लिए एक विशेष रक्षा सूत्र (काला धागा) भी देते हैं।
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आरोग्य और लंबी आयु: माता महालाया को ‘आरोग्य की देवी’ माना जाता है। जो लोग लंबे समय से गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, वे यदि यहाँ आकर लगातार नौ दिनों तक माता के सम्मुख घी का दीपक जलाते हैं, तो उन्हें गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है।
6. चौबीस खंभा माता मंदिर उज्जैन कैसे पहुँचें? (How to Reach)
चौबीस खंभा माता मंदिर उज्जैन शहर के सबसे ‘प्राइम और आध्यात्मिक’ क्षेत्र में स्थित है। यह श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के बिल्कुल नजदीक है।
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महाकाल मंदिर से दूरी: महाकालेश्वर मंदिर के मुख्य द्वार (कोटितीर्थ द्वार) से चौबीस खंभा माता मंदिर की दूरी मात्र 500 मीटर है। आप महाकाल दर्शन करने के बाद पैदल चलते हुए मात्र 5 मिनट में इस मंदिर तक पहुँच सकते हैं। बीच में प्रसिद्ध ‘बड़े गणेश मंदिर’ और ‘हरसिद्धि चौराहा’ पड़ता है।
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रेलवे स्टेशन से दूरी: उज्जैन जंक्शन (UJN) रेलवे स्टेशन से इस मंदिर की दूरी लगभग 2 किलोमीटर है।
स्थानीय यातायात के साधन (Local Transport)
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ई-रिक्शा (E-Rickshaw) सबसे सुगम माध्यम: चूंकि यह मंदिर गुदरी बाजार और महाकाल क्षेत्र के व्यस्त मार्ग पर स्थित है, यहाँ चार-पहिया वाहनों (Car/SUV) को लेकर जाना यातायात नियमों के कारण प्रतिबंधित हो सकता है।
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रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से आप मात्र ₹20-30 में शेयरिंग ई-रिक्शा लेकर सीधे चौबीस खंभा माता मंदिर के सामने उतर सकते हैं।
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यदि आप अपनी कार से आ रहे हैं, तो अपनी गाड़ी हरसिद्धि माता मंदिर के पास बनी नगर निगम की विशाल पार्किंग में खड़ी करें और वहां से पैदल या ई-रिक्शा से चौबीस खंभा मंदिर आएं।
7. श्रद्धालुओं और यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण टिप्स और सावधानियां (Practical Guide)
आपकी चौबीस खंभा माता मंदिर की यात्रा को पूरी तरह सफल और सुगम बनाने के लिए इन व्यावहारिक सुझावों का अवश्य पालन करें:
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ड्रेस कोड (Dress Code): यद्यपि यहाँ भस्म आरती जैसा कोई अनिवार्य पारंपरिक ड्रेस कोड (जैसे धोती या सोला) लागू नहीं है, फिर भी यह एक अत्यंत जाग्रत और प्राचीन शक्तिपीठ है। श्रद्धालुओं से अनुरोध है कि वे मर्यादित और शालीन वस्त्र (पुरुषों के लिए कुर्ता-पायजामा/पैंट-शर्ट और महिलाओं के लिए साड़ी/सलवार-सूट) पहनकर ही दर्शन के लिए आएं। शॉर्ट्स या स्लीवलेस कपड़े पहनने से बचें।
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फोटोग्राफी के नियम: मंदिर के बाहरी प्रांगण और प्राचीन नक्काशीदार चौबीस खंभों की तस्वीरें खींचने की पूरी अनुमति है। लेकिन मुख्य गर्भगृह के अंदर माता महालाया और माता महामाया की मूर्तियों की क्लोज-अप वीडियोग्राफी या फ्लैश फोटोग्राफी करना सख्त वर्जित है। प्रवेश करते समय अपने मोबाइल फोन को साइलेंट मोड पर रखें।
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सावधानी (दलालों से दूर रहें): नवरात्रि के दिनों में मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकानों पर भीड़ होती है। सामान्य दिनों में पूजा की टोकरी (जिसमें फूल, नारियल, सिंदूर और चुनरी होती है) बहुत ही कम दाम में मिलती है। किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को विशेष पूजा या शीघ्र दर्शन के नाम पर भारी रकम न दें।
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नवरात्रि में यात्रा की योजना: यदि आप महाअष्टमी की प्रसिद्ध ‘शासकीय महापूजा’ और 27 किलोमीटर लंबी ‘नगर पूजा’ का साक्षी बनना चाहते हैं, तो शारदीय नवरात्रि के दौरान अपनी उज्जैन यात्रा की एडवांस बुकिंग (होटल और ट्रेन टिकट) कम से कम 3 महीने पहले ही कर लें, क्योंकि इस दौरान उज्जैन के सभी होटल और धर्मशालाएं पूरी तरह फुल हो जाते हैं।
8. चौबीस खंभा माता मंदिर के आस-पास के प्रमुख दर्शनीय स्थल (Nearby Attractions)
चूंकि यह मंदिर उज्जैन के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक केंद्र में स्थित है, इसके 1 किलोमीटर के दायरे में कई अन्य विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल मौजूद हैं, जिन्हें आपको अपनी यात्रा सूची में जरूर शामिल करना चाहिए:
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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और महाकाल लोक: भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक और 900 मीटर लंबा भव्य शिव कॉरिडोर। (दूरी: 500 मीटर)
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हरसिद्धि माता मंदिर (Harsiddhi Temple): 51 शक्तिपीठों में से एक, जहाँ माता सती की कोहनी गिरी थी। यह मंदिर यहाँ से मात्र 300 मीटर की दूरी पर है। शाम के समय यहाँ के 51 फीट ऊंचे दीपस्तंभ जलाए जाते हैं।
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रामघाट (Ram Ghat): क्षिप्रा नदी का मुख्य तट जहाँ कुंभ मेले का शाही स्नान होता है और प्रतिदिन शाम को भव्य ‘क्षिप्रा आरती’ का आयोजन किया जाता है। (दूरी: 600 मीटर)
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बड़े गणेशजी का मंदिर: महाकाल मंदिर के समीप स्थित भगवान गणेश की विशाल और चमत्कारी प्रतिमा।
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गोपाल मंदिर (Gopal Mandir): सिंधिया राजवंश द्वारा निर्मित भव्य कृष्ण मंदिर, जहाँ सोमनाथ मंदिर के मूल चांदी के द्वार लगे हुए हैं। (दूरी: 800 मीटर)
उज्जैन का श्री चौबीस खंभा माता मंदिर केवल प्राचीन पत्थरों और खंभों का ढांचा नहीं है, यह सनातन धर्म की उस असीम रक्षा शक्ति, राजा विक्रमादित्य के आध्यात्मिक अनुशासन और वामाचार तंत्र के अलौकिक रहस्यों का एक सजीव प्रतीक है। सदियों पूर्व जिस स्थान को अवंतिका नगरी का मुख्य द्वार बनाकर देवियों को नगर रक्षक नियुक्त किया गया था, वे देवियाँ आज आधुनिक युग (2026) में भी पूरी भव्यता के साथ उज्जैन की और यहाँ आने वाले करोड़ों भक्तों की रक्षा कर रही हैं।
महाअष्टमी की मध्यरात्रि को होने वाली शासकीय महापूजा और उसके बाद शुरू होने वाली 27 किलोमीटर लंबी अनवरत मदिरा धार की नगर पूजा यह दर्शाती है कि भारत में आज भी परंपराएं, शास्त्र और प्रशासनिक व्यवस्थाएं एक दूसरे के पूरक बनकर जीवित हैं।
यदि आप वर्ष 2026 में महाकाल बाबा की नगरी उज्जैन आ रहे हैं, तो राजा महाकाल और सेनापति काल भैरव के दर्शनों के साथ-साथ इस नगर की प्राचीन द्वारपाल देवियों—माता महालाया और माता महामाया के चरणों में भी अपना शीश अवश्य झुकाएं। चौबीस खंभों की शीतल छांव में बैठकर माता का ध्यान करना आपके जीवन के सारे कष्टों, अज्ञानता के अंधकार और ग्रह दोषों को पल भर में दूर कर देगा।
जय माता महालाया! जय माता महामाया! जय श्री महाकाल!
10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: चौबीस खंभा माता मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर: यह मंदिर उज्जैन का प्राचीन प्रवेश द्वार है, जो 24 नक्काशीदार खंभों पर टिका हुआ है। यह मंदिर मुख्य रूप से शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर होने वाली ‘शासकीय महापूजा’ और 27 किलोमीटर लंबी ‘मदिरा धार नगर पूजा’ के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
प्रश्न 2: मंदिर के गर्भगृह में कौन सी देवियाँ विराजमान हैं?
उत्तर: मंदिर के मुख्य गर्भगृह में दो प्राचीन और जाग्रत देवियों की प्रतिमाएं एक साथ स्थापित हैं, जिन्हें माता महालाया (चौबीस खंभा माता) और माता महामाया कहा जाता है। इन्हें उज्जैन की रक्षक देवियाँ माना जाता है।
प्रश्न 3: क्या इस मंदिर में देवियों को सचमुच मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है?
उत्तर: जी हाँ, तांत्रिक और वामाचार परंपरा के अनुसार महाअष्टमी की मध्यरात्रि को शासकीय महापूजा के दौरान उज्जैन जिला प्रशासन की ओर से माता को मदिरा का भोग लगाया जाता है और फिर उसी मदिरा की अटूट धार गिराते हुए पूरे उज्जैन शहर की 27 किलोमीटर की सीमा पर परिक्रमा (नगर पूजा) की जाती है।
प्रश्न 4: चौबीस खंभा माता मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से कितनी दूर है?
उत्तर: यह मंदिर श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर और महाकाल लोक से बहुत ही करीब, मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। महाकाल मंदिर से गुदरी बाजार मार्ग पर पैदल चलते हुए मात्र 5 मिनट में यहाँ पहुँचा जा सकता है।
प्रश्न 5: क्या इस मंदिर में दर्शन के लिए कोई एंट्री फीस या पास की आवश्यकता होती है?
उत्तर: नहीं, चौबीस खंभा माता मंदिर में प्रवेश और दर्शन पूरी तरह से निःशुल्क (Free) हैं। सामान्य दिनों में यहाँ बहुत ही सुगमता से दर्शन हो जाते हैं, हालांकि नवरात्रि की अष्टमी और नवमी को यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
प्रश्न 6: विद्यार्थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लोग यहाँ क्यों आते हैं?
उत्तर: मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य ने यहीं साधना करके सिद्धियां प्राप्त की थीं। माता महामाया अज्ञानता के भ्रम को दूर करती हैं, इसलिए बुद्धि, ज्ञान और जीवन में सही निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त करने के लिए युवा यहाँ आकर माता का आशीर्वाद लेते हैं।