Asitang Bhairav Temple Ujjain: मंदिर का इतिहास, दर्शन समय और संपूर्ण जानकारीIt takes 13 minutes... to read this article !

भारत की मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से एक ‘अवंतिका’ यानी उज्जैन केवल भगवान महाकालेश्वर की नगरी ही नहीं है, बल्कि इसे तंत्र, मंत्र, यंत्र और अघोर साधनाओं की सर्वोच्च राजधानी भी माना जाता है। हिंदू धर्म और स्कंद पुराण के अनुसार, उज्जैन (Ujjain) की रक्षा का भार भगवान शिव के रौद्र और रक्षक स्वरूप ‘अष्ट भैरवों’ के पास है। तंत्र शास्त्र में भगवान भैरव के आठ मुख्य स्वरूपों (अष्ट भैरव) का वर्णन मिलता है, जिनमें सबसे प्रथम और अत्यंत रहस्यमयी स्वरूप भगवान असितांग भैरव (Asitang Bhairav) का है।

असितांग भैरव की साधना मुख्य रूप से कलात्मक क्षमताओं (Artistic abilities) को जाग्रत करने, वाक् सिद्धि (Eloquence) प्राप्त करने और राहु-केतु व शनि जैसे क्रूर ग्रहों की पीड़ा को शांत करने के लिए की जाती है। जहाँ एक ओर काल भैरव को उज्जैन का नगर कोतवाल माना जाता है, वहीं असितांग भैरव को ब्रह्मांड की असीम शून्यता और ज्ञान का प्रतीक माना गया है।

इस विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख में हम Asitang Bhairav Temple Ujjain (असितांग भैरव मंदिर उज्जैन) के इतिहास, उनके स्वरूप, तांत्रिक महत्व, दर्शन के समय, पूजा विधि और यात्रा से जुड़ी हर एक संपूर्ण जानकारी पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

1. श्री असितांग भैरव एक नज़र में (Overview Table)

जानकारी का प्रकार विवरण
मंदिर / स्वरूप का नाम श्री असितांग भैरव (Shri Asitang Bhairav)
स्थान उज्जैन (मध्य प्रदेश) की अष्ट भैरव परंपरा का अंग
भगवान का स्वरूप अष्ट भैरव में प्रथम स्वरूप
वाहन हंस (Swan)
शक्ति/सहचरी देवी माता ब्राह्मी (Maa Brahmi)
दिशा के रक्षक पूर्व दिशा (East Direction)
दर्शन का समय सुबह 06:00 बजे से रात 09:00 बजे तक
प्रमुख चढ़ावा सफेद पुष्प, तिल, मिष्ठान और सफेद चंदन
विशेष लाभ वाक् सिद्धि, रचनात्मकता में वृद्धि और शनि-राहु दोष निवारण
अन्य प्रमुख मंदिर काशी (महामृत्युंजय मंदिर के पास, वाराणसी)

2. भगवान असितांग भैरव कौन हैं? (Who is Asitang Bhairav?)

भगवान शिव के उग्र और प्रलयंकारी स्वरूप को ‘भैरव’ कहा जाता है। तंत्र शास्त्रों (जैसे विज्ञान भैरव तंत्र और रुद्रयामल तंत्र) के अनुसार, भैरव के 8 मुख्य स्वरूप हैं जिन्हें सम्मिलित रूप से अष्ट भैरव (Ashta Bhairava) कहा जाता है। इन अष्ट भैरवों में प्रथम स्थान ‘असितांग भैरव’ का है।

‘असितांग’ शब्द का अर्थ

‘असितांग’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है:

  • असित (Asit): जिसका अर्थ होता है गहरा काला (Dark) या वह जो सफेद न हो। यह रंग ब्रह्मांड की उस असीम शून्यता (Dark Matter/Void) का प्रतीक है जहाँ से सब कुछ उत्पन्न होता है और अंततः उसी में विलीन हो जाता है।

  • अंग (Ang): जिसका अर्थ है शरीर।

अर्थात, जिनका शरीर शून्यता के समान गहरा और विशाल है, वे असितांग भैरव हैं।

असितांग भैरव का अलौकिक स्वरूप

तंत्र ग्रंथों में भगवान असितांग भैरव के स्वरूप का बहुत ही रहस्यमयी वर्णन किया गया है:

  1. रंग: इनका वर्ण एकदम काला (श्याम) है।

  2. अस्त्र: असितांग भैरव अपने हाथों में मुख्य रूप से ‘कपाल’ (Skull) धारण करते हैं। कपाल अहंकार के नाश का प्रतीक है।

  3. वाहन (Vehicle): अष्ट भैरवों में असितांग भैरव का वाहन सबसे अनूठा है। ये ‘हंस’ (Swan) पर सवारी करते हैं। हंस को नीर-क्षीर विवेक (सत्य और असत्य को पहचानने की क्षमता) का प्रतीक माना जाता है।

  4. सहचरी देवी: इनकी शक्ति स्वरूपा या सहचरी ‘देवी ब्राह्मी’ (Maa Brahmi) हैं, जो माता सरस्वती का ही उग्र रूप हैं और ज्ञान तथा विद्या का संचार करती हैं।

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3. असितांग भैरव मंदिर उज्जैन का इतिहास और पौराणिक महत्व (History of Asitang Bhairav in Ujjain)

उज्जैन को ‘महाकाल वन’ भी कहा जाता है। शिव पुराण और स्कंद पुराण के ‘अवंती खंड’ के अनुसार, जब भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए भैरव का रूप धारण किया था, तब उस महा-भैरव के शरीर से आठ अलग-अलग दिशाओं की रक्षा के लिए अष्ट भैरव प्रकट हुए थे।

उज्जैन में अष्ट भैरव परंपरा

उज्जैन में भैरव उपासना, विशेषकर कापालिक (Kapalika) और अघोर (Aghori) संप्रदायों द्वारा सदियों से की जा रही है। अष्ट भैरव यात्रा उज्जैन की एक बहुत ही प्राचीन तांत्रिक परिक्रमा है। पूर्व दिशा के अधिपति होने के नाते, असितांग भैरव का आह्वान उज्जैन में किसी भी बड़ी साधना को शुरू करने से पहले किया जाता है।

शाप से मुक्ति का इतिहास

कथाओं के अनुसार, जब भगवान भैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया था, तो उन्हें ‘ब्रह्महत्या’ का पाप लग गया था। ब्रह्महत्या के पाप के कारण ब्रह्मा जी का वह कटा हुआ सिर (कपाल) भैरव के हाथ से चिपक गया था। इस शाप से मुक्ति पाने के लिए भैरव देव ने तीनों लोकों का भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने अपने अष्ट स्वरूपों के माध्यम से उज्जैन (अवंतिका) और काशी जैसे मोक्षदायी तीर्थों में विश्राम किया और तपस्या की। इसी कारण उज्जैन और काशी, दोनों ही स्थानों पर अष्ट भैरवों का विशेष प्रभाव और उनके जाग्रत मंदिर स्थित हैं।

(ध्यान दें: जहाँ उज्जैन तंत्र का हृदय है और यहाँ अष्ट भैरवों का संयुक्त आह्वान किया जाता है, वहीं असितांग भैरव का एक बहुत ही प्रसिद्ध और प्राचीन भौतिक मंदिर काशी (वाराणसी) के महामृत्युंजय मंदिर (K 52/39) के पास स्थित है। उज्जैन आने वाले तांत्रिक और साधक भी असितांग भैरव के ध्यान और दर्शन के लिए उनकी मानसिक और भौतिक स्थापनाओं पर दर्शन करते हैं।)

4. असितांग भैरव साधना और तांत्रिक रहस्य (Tantric Secrets of Asitang Bhairav)

असितांग भैरव की साधना सामान्य पूजा से थोड़ी अलग और अत्यधिक शक्तिशाली होती है। यह साधना मुख्य रूप से उन लोगों द्वारा की जाती है जो अपने जीवन में कुछ नया रचना चाहते हैं या जिन्हें वाणी की शक्ति चाहिए।

1. वाक् सिद्धि (Power of Speech)

असितांग भैरव की सहचरी देवी ब्राह्मी (ज्ञान की देवी) हैं और इनका वाहन हंस है। जो साधक असितांग भैरव की उपासना करते हैं, उन्हें ‘वाक् सिद्धि’ प्राप्त होती है। वाक् सिद्धि का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी वाणी से दूसरों को तुरंत प्रभावित कर सकता है। संगीतकारों, लेखकों, कवियों, वकीलों और राजनेताओं के लिए असितांग भैरव की पूजा अचूक फल देने वाली मानी जाती है।

2. रचनात्मकता (Creativity) का जागरण

असितांग भैरव पूर्व दिशा के रक्षक हैं। पूर्व दिशा से सूर्य का उदय होता है, जो नई शुरुआत और रचनात्मकता का प्रतीक है। इनकी साधना से साधक के मस्तिष्क में नए विचार (Ideas) उत्पन्न होते हैं और उसकी कलात्मक क्षमताएं कई गुना बढ़ जाती हैं।

3. क्रूर ग्रहों (राहु-शनि) की शांति

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भगवान भैरव को राहु और शनि देव का नियंत्रक माना जाता है। जिन लोगों की कुंडली में राहु की महादशा चल रही हो, कालसर्प दोष हो या शनि की साढ़ेसाती से परेशान हों, उन्हें असितांग भैरव के दर्शन और पूजन से तत्काल राहत मिलती है।

5. भगवान असितांग भैरव पूजा विधि (Worship Rules and Puja Vidhi)

असितांग भैरव की पूजा को सात्विक और तांत्रिक दोनों विधियों से किया जा सकता है। सामान्य गृहस्थों के लिए सात्विक विधि ही श्रेष्ठ मानी जाती है।

पूजा के प्रमुख चरण (Steps of Worship):

  1. पवित्रता: भगवान असितांग भैरव की पूजा में स्वच्छता का बहुत ध्यान रखना चाहिए। स्नान के पश्चात स्वच्छ सफेद या लाल वस्त्र धारण करें।

  2. दीपक: भगवान के समक्ष सरसों के तेल या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।

  3. पुष्प और नैवेद्य: चूँकि असितांग भैरव का वाहन हंस (सफेद) है और उनकी शक्ति ब्राह्मी हैं, इसलिए इन्हें सफेद पुष्प (जैसे मोगरा या चमेली) विशेष रूप से प्रिय हैं। नैवेद्य के रूप में सफेद मिष्ठान, उड़द की दाल की कचोरी या काले तिल अर्पित किए जाते हैं।

  4. मंत्र जाप: असितांग भैरव का मूल मंत्र है:

    “ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं असितांग भैरवाय नमः”

    रुद्राक्ष या काले हकीक की माला से इस मंत्र का कम से कम 108 बार (एक माला) जाप करने से भगवान तुरंत प्रसन्न होते हैं।

  5. आरती: पूजा के अंत में कपूर और लौंग जलाकर भगवान की आरती करें और अपनी गलतियों की क्षमा मांगें।

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(नोट: तांत्रिक साधनाएं हमेशा किसी योग्य और सिद्ध गुरु के निर्देशन में ही की जानी चाहिए, क्योंकि भैरव साधनाओं में की गई छोटी सी चूक भी कष्टकारी हो सकती है।)

6. Asitang Bhairav Temple Ujjain दर्शन का समय (Darshan Timings)

उज्जैन में भैरव मंदिरों में दर्शन और आरती का समय लगभग एक समान ही होता है। यदि आप भैरव दर्शन के लिए जा रहे हैं, तो समय सारिणी का ध्यान रखें:

दर्शन/आरती समय विवरण
प्रातः कालीन दर्शन सुबह 06:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक सुबह का समय भगवान के बाल और सात्विक रूप के दर्शन का होता है। ध्यान लगाने के लिए यह सबसे अच्छा समय है।
विश्राम का समय दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 03:00 बजे तक अधिकतर भैरव पीठों में दोपहर के समय कपाट बंद रखे जाते हैं।
संध्या आरती और दर्शन शाम 04:00 बजे से रात 09:00 बजे तक तंत्र शास्त्र में भैरव उपासना के लिए सूर्यास्त के बाद का समय (प्रदोष काल) सबसे उत्तम माना गया है।

विशेष दिन: भगवान भैरव को रविवार और मंगलवार का दिन अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (कालाष्टमी) के दिन यहाँ विशेष तांत्रिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

7. काशी और उज्जैन: असितांग भैरव के दो प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र

जब भी अष्ट भैरव या असितांग भैरव की बात आती है, तो भारत के दो सबसे पवित्र शहरों— उज्जैन (अवंतिका) और काशी (वाराणसी) का नाम सबसे ऊपर आता है।

  • काशी का असितांग भैरव मंदिर: यह मंदिर वाराणसी में K 52/39, महामृत्युंजय मंदिर और वृद्ध कालेश्वर के पास स्थित है। काशी खण्ड में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि जो कोई भी काशी की तीर्थ यात्रा करता है, उसे अष्ट भैरव के दर्शन अवश्य करने चाहिए, जिसमें असितांग भैरव का दर्शन प्रथम है।

  • उज्जैन का महत्व: उज्जैन में तंत्र और कापालिक साधना का गढ़ होने के कारण, अष्ट भैरवों की सूक्ष्म और जाग्रत ऊर्जा पूरे शहर में व्याप्त है। उज्जैन आने वाले कई साधक मानसिक रूप से या स्थानीय स्थापित वेदियों पर अष्ट भैरव (जिसमें असितांग भैरव भी शामिल हैं) का आह्वान करके अपनी साधना को पूर्ण करते हैं। महाकालेश्वर की नगरी में भैरव की अनुमति के बिना कोई भी तंत्र प्रयोग सफल नहीं होता।

8. मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख उत्सव (Major Festivals)

असितांग भैरव और अष्ट भैरवों से जुड़े कुछ प्रमुख त्योहार यहाँ बड़ी ही धूमधाम और रहस्यमयी तांत्रिक परंपराओं के साथ मनाए जाते हैं:

  1. भैरव अष्टमी (Bhairav Ashtami): मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भैरव बाबा का प्राकट्य दिवस (जन्मदिन) मनाया जाता है। इस दिन अष्ट भैरव मंदिरों में विशेष महा-आरती, हवन और भंडारे का आयोजन होता है।

  2. कालाष्टमी (Kalashtami): प्रत्येक हिंदू महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी कहा जाता है। इस दिन रात भर भगवान भैरव की उपासना की जाती है।

  3. नवरात्रि (Navratri): उज्जैन में नवरात्रि (विशेषकर गुप्त नवरात्रि) के दौरान देवी और भैरव की संयुक्त पूजा का बहुत महत्व है। माता ब्राह्मी की शक्ति के साथ असितांग भैरव का विशेष अनुष्ठान किया जाता है।

  4. महाशिवरात्रि (Maha Shivaratri): भगवान शिव के इस सबसे बड़े पर्व पर उनके रुद्रांश भैरव की भी विशेष साज-सज्जा और पूजा की जाती है।

9. दर्शनार्थियों के लिए नियम और सावधानियां (Rules and Precautions)

भैरव मंदिर एक सिद्ध और जाग्रत स्थल होते हैं, अतः यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को कुछ नियमों का पालन करना चाहिए:

  • साफ-सफाई: मंदिर परिसर में पूर्ण स्वच्छता बनाए रखें। बिना स्नान किए भगवान की मूर्ति या उनके कपाल अस्त्र को स्पर्श न करें।

  • मर्यादित वस्त्र: पुरुष और महिलाएं, दोनों को भारतीय पारंपरिक वस्त्र (जैसे कुर्ता-पायजामा, धोती, साड़ी या सूट) पहनकर ही दर्शन के लिए जाना चाहिए।

  • चमड़े की वस्तुओं का निषेध: मंदिर के गर्भगृह के निकट चमड़े की बेल्ट, पर्स या जैकेट लेकर न जाएँ।

  • भयमुक्त मन: भैरव दर्शन के समय मन में डर या नकारात्मक विचार नहीं होने चाहिए। वे अपने भक्तों के लिए दयालु और दुष्टों के लिए प्रलयंकारी हैं।

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10. उज्जैन कैसे पहुँचें? (How to Reach Ujjain)

उज्जैन शहर मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित है और देश के सभी बड़े शहरों से सड़क, रेल और वायु मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

  • वायु मार्ग द्वारा (By Air): उज्जैन का अपना कोई एयरपोर्ट नहीं है। यहाँ से सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट ‘देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, इंदौर’ (Indore Airport – IDR) है, जो उज्जैन से मात्र 55-60 किलोमीटर की दूरी पर है। इंदौर से आप कैब या वॉल्वो बस के माध्यम से 1 से 1.5 घंटे में उज्जैन पहुँच सकते हैं।

  • रेल मार्ग द्वारा (By Train): ‘उज्जैन जंक्शन’ (Ujjain Junction) एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, जयपुर और भोपाल से उज्जैन के लिए कई सीधी और तेज़ ट्रेनें उपलब्ध हैं।

  • सड़क मार्ग द्वारा (By Road): उज्जैन बेहतरीन स्टेट और नेशनल हाईवे के नेटवर्क से जुड़ा है। आप बस या अपनी निजी गाड़ी से आसानी से यहाँ पहुँच सकते हैं।

  • स्थानीय परिवहन (Local Transport): उज्जैन शहर के भीतर मंदिरों के दर्शन के लिए ई-रिक्शा, ऑटो और टाटा मैजिक सबसे सुलभ साधन हैं।

11. आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल (Nearby Attractions in Ujjain)

उज्जैन की यात्रा अष्ट भैरव और भगवान शिव के अन्य मंदिरों के दर्शन के बिना पूरी नहीं मानी जाती। अपनी यात्रा में इन स्थानों को अवश्य शामिल करें:

  1. श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, दक्षिणमुखी शिवलिंग, जहाँ की भस्म आरती पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

  2. काल भैरव मंदिर (Kaal Bhairav Temple): अष्ट भैरव में सबसे प्रमुख, जिन्हें मदिरा का भोग लगाया जाता है। यह मंदिर उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित है।

  3. विक्रांत भैरव और दंडपाणि भैरव: अष्ट भैरव के अन्य शक्तिशाली स्वरूप जिनके मंदिर उज्जैन में तांत्रिकों के बीच बहुत प्रसिद्ध हैं।

  4. हरसिद्धि माता मंदिर: 51 शक्तिपीठों में से एक, जहाँ माता सती की कोहनी गिरी थी।

  5. मंगलनाथ मंदिर: इस मंदिर को पृथ्वी का केंद्र (नाभि) माना जाता है। यहाँ मंगल दोष शांति की विशेष पूजा होती है।

  6. भर्तृहरी गुफाएं: महान राजा और योगी भर्तृहरी की तपस्थली।

भगवान असितांग भैरव केवल विनाश के देवता नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड की उस असीम शून्यता का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ से सब कुछ जन्म लेता है। उनकी शक्ति ‘ब्राह्मी’ और उनका वाहन ‘हंस’ इस बात का प्रमाण हैं कि भैरव की उपासना से व्यक्ति के भीतर ज्ञान, रचनात्मकता और सही-गलत की पहचान (विवेक) का जागरण होता है।

अष्ट भैरवों की पावन भूमि उज्जैन (Ashta Bhairav Ujjain) में आकर भगवान असितांग भैरव का मानसिक ध्यान और दर्शन करने से जीवन के सभी भय, रोग, और क्रूर ग्रहों के दोष समाप्त हो जाते हैं। यदि आप अपने जीवन में नई ऊर्जा, वाक् सिद्धि और कलात्मक क्षमता पाना चाहते हैं, तो एक बार भगवान असितांग भैरव की शरण में अवश्य जाएँ। बाबा भैरवनाथ अपने भक्तों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. असितांग भैरव कौन हैं और अष्ट भैरव में उनका क्या स्थान है?

उत्तर: असितांग भैरव भगवान शिव के ही उग्र और रक्षक स्वरूप हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार वर्णित आठ मुख्य भैरवों (अष्ट भैरव) में असितांग भैरव का स्थान सबसे पहला (प्रथम) है। वे पूर्व दिशा के रक्षक माने जाते हैं।

Q2. असितांग भैरव का वाहन और अस्त्र क्या है?

उत्तर: असितांग भैरव का वाहन ‘हंस’ (Swan) है और इनकी सहचरी देवी ब्राह्मी हैं। भगवान असितांग भैरव अपने हाथ में मुख्य रूप से अस्त्र के रूप में ‘कपाल’ (मनुष्य की खोपड़ी/Skull) धारण करते हैं, जो अहंकार के नाश का प्रतीक है।

Q3. असितांग भैरव की पूजा करने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: भगवान असितांग भैरव की पूजा विशेष रूप से वाक् सिद्धि (वाणी का प्रभाव) प्राप्त करने, कलात्मक और रचनात्मक (Creative) क्षमताओं को बढ़ाने, और शनि-राहु जैसे क्रूर ग्रहों की पीड़ा (दोष) को शांत करने के लिए की जाती है।

Q4. Asitang Bhairav Temple Ujjain में दर्शन का उत्तम समय क्या है?

उत्तर: भैरव उपासना के लिए सूर्यास्त के बाद का समय (प्रदोष काल) सबसे उत्तम माना जाता है। दर्शनार्थी शाम 04:00 बजे से रात 09:00 बजे के बीच दर्शन और आरती का लाभ ले सकते हैं। रविवार और कालाष्टमी के दिन दर्शन का विशेष महत्व है।

Q5. क्या उज्जैन और काशी के असितांग भैरव मंदिरों में कोई संबंध है?

उत्तर: जी हाँ, दोनों ही शहर मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में आते हैं और तंत्र के गढ़ हैं। जहाँ असितांग भैरव का भौतिक और प्रसिद्ध मंदिर काशी (वाराणसी) में महामृत्युंजय मंदिर के पास स्थित है, वहीं उज्जैन में अष्ट भैरव परंपरा के अंतर्गत अघोरियों और तांत्रिकों द्वारा इनका विशेष आह्वान और परिक्रमा की जाती है। दोनों ही स्थान भैरव भक्तों के लिए समान रूप से पूजनीय हैं।

Amit Tiwari (Ujjain)

"नमस्कार, मेरा नाम अमित तिवारी है और मैं ujjainmahakal.co.in का संस्थापक (Founder) तथा मुख्य लेखक हूँ। बाबा महाकाल की पावन नगरी उज्जैन से मेरा गहरा आत्मीय जुड़ाव है। इस वेबसाइट की स्थापना के पीछे मेरा मुख्य उद्देश्य भगवान महाकालेश्वर की महिमा, उज्जैन के प्राचीन मंदिरों और यहाँ की सनातन संस्कृति की प्रामाणिक जानकारी आप सभी भक्तों तक डिजिटल माध्यम से पहुँचाना है। मेरी कोशिश रहती है कि महाकाल के हर भक्त को घर बैठे यहाँ की दिव्यता और सटीक जानकारी प्राप्त हो। जय श्री महाकाल!"

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