सनातन धर्म की सात मोक्षदायिनी पुरियों में अग्रगण्य ‘अवंतिका नगरी’ (वर्तमान उज्जैन) केवल देवाधिदेव महादेव के दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड में तंत्र, मंत्र, अघोर और साधना का सबसे बड़ा केंद्र है। महाकाल वन की इस पावन भूमि के कण-कण में शिव और शक्ति का वास है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान महाकाल जहाँ इस नगरी के अधिपति और राजा हैं, वहीं इसकी सुरक्षा और व्यवस्था का जिम्मा भगवान शिव के ही उग्र स्वरूप ‘अष्ट भैरव’ (Eight Bhairavas) के हाथों में है।
इन्हीं अष्ट भैरवों में एक परम जाग्रत, भय का समूल नाश करने वाले और ज्ञान के परम दाता स्वरूप का नाम है— श्री कपाल भैरव (Shri Kapal Bhairav)। इन्हें ‘कपाली भैरव’ भी कहा जाता है। इनका संबंध सीधे तौर पर ब्रह्मांड के निर्माण, संहार और प्राचीन ‘कापालिक संप्रदाय’ (Kapalika Sect) से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि जो भी भक्त या साधक कपाल भैरव के शरण में आता है, उसके जीवन से अकाल मृत्यु का भय, कानूनी अड़चनें, मानसिक विकार और शत्रुओं का आतंक सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
इस विशेष खोजी और विस्तृत लेख में हम Kapal Bhairav Ujjain (कपाल भैरव मंदिर उज्जैन) के इतिहास, उनके स्वरूप, तांत्रिक महत्व, दर्शन के समय, पूजा विधि और यहाँ की यात्रा से जुड़ी हर एक बारीक जानकारी को विस्तार से समझेंगे।
1. श्री कपाल भैरव मंदिर: एक संक्षिप्त परिचय (Overview Table)
| जानकारी का क्षेत्र | विवरण |
| मंदिर का नाम | श्री कपाल भैरव मंदिर (Shri Kapal Bhairav Mandir) |
| स्थान | उज्जैन, मध्य प्रदेश (महाकाल की पावन नगरी) |
| मुख्य देवता | भगवान कपाल भैरव (भगवान शिव का उग्र रुद्रांश) |
| अष्ट भैरव क्रम | तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार अष्ट भैरवों में विशिष्ट स्थान |
| वाहन (Vehicle) | गज (हाथी / Elephant) |
| सहचरी देवी (Shakti) | माता इंद्राणी / कपाली (Maa Indrani) |
| दिशा के स्वामी | उत्तर-पश्चिम दिशा (North-West Direction) |
| दर्शन का समय | सुबह 06:00 बजे से रात 09:00 बजे तक |
| मुख्य भोग/चढ़ावा | सिंदूर, चमेली का तेल, काले तिल, नारियल, और ऋतु फल |
| विशेष पूजा लाभ | मानसिक शांति, अहंकार का नाश, कानूनी विवादों में विजय, और राहु-केतु दोष मुक्ति |
2. भगवान कपाल भैरव कौन हैं? (Who is Lord Kapal Bhairav?)
‘कपाल’ शब्द का साधारण अर्थ होता है— ‘मनुष्य की खोपड़ी’ या ‘मस्तिष्क का पात्र’। तंत्र शास्त्र और शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव के इस स्वरूप का नाम ‘कपाल भैरव’ होने के पीछे गहरे आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय रहस्य छिपे हैं।
‘कपाल’ शब्द का तांत्रिक और आध्यात्मिक अर्थ
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अहंकार के विसर्जन का प्रतीक: जब ब्रह्मा जी के भीतर सृष्टि के निर्माण का अहंकार जागृत हुआ, तो भगवान शिव ने उनके उस अहंकारी पांचवें सिर को काट दिया था। ब्रह्मा जी का वह कटा हुआ सिर (कपाल) शिव के हाथ में ही चिपक गया। शिव ने उसी कपाल को अपना भिक्षा-पात्र बनाया। यही स्वरूप ‘कपाल भैरव’ कहलाया। यह सिखाता है कि ईश्वर के सामने ज्ञान का अहंकार भी टिक नहीं सकता।
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शून्यता और वैराग्य: कपाल जीवन की नश्वरता को दर्शाता है। कपाल भैरव हमें याद दिलाते हैं कि यह संसार क्षणभंगुर है और अंततः सब कुछ मिट्टी में मिल जाना है। इसलिए, सांसारिक मोह से ऊपर उठकर वैराग्य और आत्मज्ञान की ओर बढ़ना ही जीवन का परम लक्ष्य है।
कपाल भैरव का शास्त्रीय स्वरूप
तांत्रिक ग्रंथों (जैसे ‘रुद्रयामल तंत्र’ और ‘शैव आगम’) के अनुसार, कपाल भैरव का स्वरूप अत्यंत भव्य और चमकीला है:
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वर्ण (Complexion): इनका शरीर स्वर्ण के समान पीला या अति तेजस्वी श्याम वर्ण का है।
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अस्त्र-शस्त्र: वे अपने हाथों में मुख्य रूप से त्रिशूल, तलवार, खेटक (ढाल) और एक ‘कपाल’ (Skull-cup) धारण करते हैं।
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वाहन: कपाल भैरव का वाहन ‘गज’ (हाथी) है, जो शक्ति, ऐश्वर्य, स्थिरता और अगाध बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
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शक्ति: इनकी दिव्य सहचरी ‘माता इंद्राणी’ या ‘कपाली’ हैं, जो साधक को सभी प्रकार के भौतिक सुख और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।
3. कपाल भैरव मंदिर का पौराणिक इतिहास (Mythological History of Kapal Bhairav)
उज्जैन के कपाल भैरव मंदिर का इतिहास सतयुग और स्कंद पुराण के ‘अवंत्य खंड’ से जुड़ा हुआ है। इसके प्राकट्य और महत्व के पीछे एक बेहद रोचक कथा मिलती है।
ब्रह्मा जी के अहंकार का दमन और कपाल व्रत
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी और पालनकर्ता भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि दोनों में से श्रेष्ठ कौन है। विवाद का हल निकालने के लिए वेदों से पूछा गया, तो वेदों ने कहा कि भगवान शिव ही सर्वोपरि और परम तत्व हैं। यह सुनकर ब्रह्मा जी को अपने ज्ञान पर घमंड हो गया और उन्होंने अपने पांचवें मुख से भगवान शिव की निंदा कर दी।
ब्रह्मा जी के इस अनुचित व्यवहार को देखकर भगवान शिव के अत्यंत उग्र रूप ‘काल भैरव’ प्रकट हुए। उन्होंने क्षण भर में ब्रह्मा जी का वह पांचवां सिर काट दिया। लेकिन, ब्रह्मा जी त्रिगुणों के स्वामी और ब्राह्मण थे, इसलिए भैरव जी पर ‘ब्रह्महत्या’ का घोर पाप लग गया और वह कटा हुआ सिर (कपाल) उनके बाएं हाथ से चिपक गया।
[ब्रह्मा जी का अहंकार] ──> [शिव का क्रोध / भैरव का प्राकट्य] ──> [पांचवें सिर का छेदन] ──> [ब्रह्महत्या का पाप और कपाल का हाथ में चिपकना]
इस पाप के प्रायश्चित और शाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव ने ‘कपाल व्रत’ धारण किया। वे तीनों लोकों में कपाल को हाथ में लेकर भिक्षा मांगते हुए भटकने लगे। जब वे महाकाल वन (उज्जैन) की पावन भूमि पर पहुँचे और शिप्रा नदी के पवित्र जल में स्नान किया, तब जाकर वह कपाल उनके हाथ से छूटा और वे ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए। जिस स्थान पर यह घटना घटी और जहाँ भैरव जी की दिव्य शक्ति स्थापित हुई, वही स्थान आज ‘कपाल भैरव मंदिर’ के नाम से पूजनीय है।
4. उज्जैन का प्राचीन ‘कापालिक संप्रदाय’ और कपाल भैरव (The Kapalika Sect and Ujjain)
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो उज्जैन प्राचीन काल में ‘कापालिक संप्रदाय’ और ‘नाथ संप्रदाय’ की मुख्य तपोभूमि रहा है। महान संस्कृत कवि बाणभट्ट के ‘कादंबरी’ और भवभूति के ‘मालतीमाधव’ जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों में उज्जैन के श्मशानों और भैरव मंदिरों में कापालिकों द्वारा की जाने वाली कठिन साधनाओं का जीवंत वर्णन मिलता है।
कापालिकों के आराध्य देव
कापालिक संप्रदाय के साधक भगवान शिव को महाकाल और भैरव के रूप में पूजते थे। उनके लिए ‘कपाल भैरव’ सबसे प्रमुख आराध्य देव थे। वे अपने साथ हमेशा एक नर-कपाल रखते थे, उसी में भोजन और जल ग्रहण करते थे, और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।
कापालिक साधकों का मानना था कि कपाल भैरव की उपासना से मनुष्य प्रकृति के अष्ट सिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा आदि) पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। समय के साथ, आदि शंकराचार्य जी के आगमन के बाद, इस संप्रदाय के उग्र और तामसिक रूपों में सुधार हुआ और आज यहाँ पूरी तरह से सात्विक और राजसिक वैदिक पद्धति से पूजा-अर्चना की जाती है।
5. मंदिर की वास्तुकला और दिव्य प्रतिमा (Architecture and Divine Idol)
उज्जैन का कपाल भैरव मंदिर स्थापत्य कला और ऊर्जा की दृष्टि से एक अद्भुत स्थान है। यह मंदिर बहुत अधिक भव्य या आधुनिक तामझाम से युक्त नहीं है, बल्कि इसमें प्राचीनता और सादगी का एक सुंदर संगम देखने को मिलता है।
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गर्भगृह (Sanctum Sanctorum): मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान कपाल भैरव की एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा पर सदियों से सिंदूर और चमेली के तेल का चोला चढ़ाया जा रहा है, जिससे मूर्ति का स्वरूप बेहद जाग्रत और तेजोमय दिखाई देता है।
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आंखें: भगवान की आँखें बड़ी और सम्मोहक हैं, जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे साधक के अंतर्मन को सीधे देख रहे हैं।
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परिसर की ऊर्जा: मंदिर परिसर में कदम रखते ही एक अजीब सी शांति और भारीपन (Cosmic Energy) का अहसास होता है। यहाँ बैठकर मंत्र जाप करने से मन की चंचलता तुरंत शांत हो जाती है।
6. कपाल भैरव की पूजा के आध्यात्मिक और ज्योतिषीय लाभ (Astrological Benefits)
वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र में कपाल भैरव की पूजा को जीवन के सबसे कठिन कष्टों का अचूक निवारण माना गया है।
1. राहु, केतु और शनि जनित दोषों से मुक्ति
नवग्रहों में राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है, जिनका स्वभाव उग्र और आकस्मिक होता है। चूँकि भगवान भैरव इन दोनों ही क्रूर ग्रहों के नियंत्रक देव हैं, इसलिए जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष (Kalsarp Dosh), राहु की महादशा, या शनि की साढ़ेसाती चल रही हो, उन्हें कपाल भैरव की आराधना से तुरंत मानसिक और शारीरिक कष्टों से राहत मिलती है।
2. मानसिक विकारों और अवसाद (Depression) का अंत
चूँकि ‘कपाल’ मस्तिष्क का प्रतीक है, इसलिए वे लोग जो गंभीर मानसिक तनाव, अनिद्रा, अज्ञात भय, मतिभ्रम, या डिप्रेशन से जूझ रहे हैं, उनके लिए कपाल भैरव के दर्शन अमृत के समान हैं। भगवान उनके मस्तिष्क की नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेते हैं और उन्हें सकारात्मक बुद्धि प्रदान करते हैं।
3. अदालती मामलों और शत्रुओं पर विजय
यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में गुप्त शत्रुओं से परेशान है या किसी झूठे कानूनी मुकदमे (Court Cases) में उलझ गया है, तो उसे कपाल भैरव के सम्मुख सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाकर ‘भैरव अष्टक’ का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से शत्रुओं का पराभव होता है और न्याय की प्राप्ति होती है।
7. भगवान कपाल भैरव की पूजा विधि और भोग (Worship Rituals and Offerings)
कपाल भैरव मंदिर में गृहस्थों के लिए सात्विक और आसान पूजा विधि अपनाई जाती है, जबकि गुप्त नवरात्रों में यहाँ तांत्रिक अनुष्ठान भी होते हैं।
दैनिक सात्विक पूजा विधि:
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स्नान और वस्त्र: दर्शनार्थी सुबह या शाम को स्नान करके साफ कपड़े (संभव हो तो लाल या पीले वस्त्र) पहनकर मंदिर जाएँ।
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चोला अर्पण: भगवान को चमेली का तेल और सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाया जाता है। यह कार्य अक्सर मंदिर के पुजारी जी के माध्यम से संपन्न होता है।
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भोग सामग्रियां: कपाल भैरव जी को नारियल, इमरती, उड़द की दाल के वड़े, और ऋतु फल अर्पित किए जाते हैं।
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दीपक: सरसों के तेल या शुद्ध घी का दीपक जलाकर भगवान की आरती की जाती है।
विशेष मंत्र: मंदिर में बैठकर या घर पर पूजा करते समय इस प्रभावशाली मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए:
ॐ ह्रीं कपाल भैरवाय नमःयाॐ भं भैरवाय अनिष्टनिवारणाय स्वाहा।
8. मंदिर के दर्शन का समय और आरती की समय-सारिणी (Timings)
यदि आप उज्जैन यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो कपाल भैरव मंदिर के खुलने और बंद होने का समय नोट करना आपके लिए बेहद मददगार साबित होगा:
| प्रहर | खुलने का समय | बंद होने का समय | विशेष विवरण |
| प्रातः काल (Morning) | सुबह 06:00 बजे | दोपहर 12:30 बजे | इस समय भगवान का मुख्य श्रृंगार और सुबह की आरती होती है। |
| दोपहर (विश्राम) | दोपहर 12:30 बजे | दोपहर 03:30 बजे | दोपहर के समय मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। |
| सायं काल (Evening) | दोपहर 03:30 बजे | रात 09:00 बजे | शाम की महा-आरती और दीपदान के लिए यह समय सबसे उत्तम माना जाता है। |
नोट: रविवार, मंगलवार और प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कालाष्टमी) के दिन मंदिर रात 10:00 बजे तक खुला रह सकता है, क्योंकि इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या काफी अधिक होती है।
9. मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहार और उत्सव (Major Festivals)
कपाल भैरव मंदिर में साल के कुछ विशेष दिनों में अलौकिक उत्सव का माहौल रहता है। इन अवसरों पर भगवान के दर्शन का पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।
1. कालभैरव जयंती (भैरव अष्टमी)
मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान भैरव का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन पूरे उज्जैन के भैरव मंदिरों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। कपाल भैरव मंदिर में ५६ भोग का अन्नकूट लगाया जाता है और मध्यरात्रि में महा-अभिषेक और तांत्रिक हवन किया जाता है।
2. महाशिवरात्रि
चूँकि कपाली भैरव भगवान शिव के ही साक्षात अंश हैं, इसलिए महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहाँ रात भर चार प्रहर की विशेष पूजा चलती है। इस दिन हज़ारों की संख्या में महाकाल के भक्त यहाँ माथा टेकने आते हैं।
3. गुप्त नवरात्रि
साल में आने वाली दो गुप्त नवरात्रों (माघ और आषाढ़ मास) के दौरान कपाल भैरव मंदिर साधकों और अघोरियों के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। इन नौ दिनों में ब्रह्मांड की दस महाविद्याओं के साथ भगवान कपाल भैरव की गुप्त साधनाएं की जाती हैं।
10. दर्शनार्थियों के लिए महत्वपूर्ण नियम और सावधानियां (Do’s and Don’ts)
एक जाग्रत तांत्रिक पीठ होने के कारण श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर के भीतर कुछ कड़े नियमों और मर्यादाओं का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
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मर्यादित पहनावा: छोटे कपड़े, बरमूडा या अमर्यादित वस्त्र पहनकर मंदिर में प्रवेश न करें। भारतीय पारंपरिक परिधान ही पहनें।
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स्वच्छता का ध्यान: मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर परिसर में जाने से बचना चाहिए।
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शांत मन: मंदिर के भीतर ज़ोर-ज़ोर से हँसना, बातें करना या मोबाइल का अत्यधिक उपयोग करना वर्जित है। यह साधना की भूमि है, अतः मौन रहकर भगवान का ध्यान करें।
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नशे से दूर रहें: मंदिर क्षेत्र के आसपास किसी भी प्रकार का नशा (धूम्रपान या मदिरापान) करके जाना सख्त मना है।
11. उज्जैन स्थित कपाल भैरव मंदिर कैसे पहुँचें? (How to Reach)
उज्जैन भारत के सभी प्रमुख हिस्सों से रेल, सड़क और हवाई मार्ग द्वारा बहुत अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
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हवाई मार्ग द्वारा (By Air): उज्जैन का अपना कोई कमर्शियल एयरपोर्ट नहीं है। सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा ‘देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, इंदौर’ है, जो उज्जैन से लगभग 55 किलोमीटर दूर है। इंदौर एयरपोर्ट से आप आसानी से प्रीपेड टैक्सी, कैब या वॉल्वो बस लेकर लगभग 1 घंटे में उज्जैन शहर पहुँच सकते हैं।
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रेल मार्ग द्वारा (By Train): ‘उज्जैन जंक्शन’ (UJN) पश्चिमी रेलवे का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहाँ दिल्ली, मुंबई, जयपुर, चेन्नई, अहमदाबाद और कोलकाता से सीधी सुपरफास्ट ट्रेनें आती हैं। रेलवे स्टेशन से कपाल भैरव मंदिर की दूरी मात्र 5 से 6 किलोमीटर है।
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सड़क मार्ग द्वारा (By Road): मध्य प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों (जैसे भोपाल, इंदौर, ग्वालियर) से उज्जैन के लिए नियमित रूप से लक्ज़री और राज्य परिवहन की बसें चलती हैं।
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स्थानीय परिवहन (Local Commute): उज्जैन रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से आपको मंदिर जाने के लिए चौबीसों घंटे ऑटो-रिक्शा, ई-रिक्शा और ओला/उबर कैब की सुविधा मिल जाएगी। आप ई-रिक्शा वाले से अष्ट भैरव श्रृंखला के ‘कपाल भैरव’ मंदिर चलने के लिए कह सकते हैं।
12. कपाल भैरव मंदिर के आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल (Nearby Attractions)
जब आप कपाल भैरव मंदिर के दर्शन के लिए उज्जैन आएँ, तो अपनी धार्मिक यात्रा को पूर्ण बनाने के लिए आसपास के इन विश्व प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन भी अवश्य करें:
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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: विश्व का एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग, जहाँ भस्म आरती देखना जीवन का सबसे अलौकिक अनुभव माना जाता है।
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श्री काल भैरव मंदिर: उज्जैन के अष्ट भैरवों में सबसे प्रमुख और नगर के कोतवाल, जिन्हें साक्षात मदिरा का भोग लगाया जाता है।
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श्री विक्रांत भैरव मंदिर: शिप्रा नदी के तट पर ओखलेश्वर श्मशान के पास स्थित एक और महा-जाग्रत तांत्रिक पीठ।
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हरसिद्धि माता शक्तिपीठ: राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी, जहाँ माता सती की बाईं कोहनी गिरी थी। यह भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है।
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गढ़कालिका मंदिर: महाकवि कालिदास की इष्टदेवी का प्राचीन मंदिर, जो तंत्र साधना का एक और बड़ा केंद्र है।
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भर्तृहरी गुफाएं: राजा भर्तृहरी की तपोस्थली, जहाँ उन्होंने राजपाट छोड़कर वर्षों तक भगवान शिव की कठिन आराधना की थी।
उज्जैन का श्री कपाल भैरव मंदिर केवल एक ऐतिहासिक इमारत या पत्थरों की मूर्ति मात्र नहीं है, बल्कि यह अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक जीवंत स्रोत है। ब्रह्मा जी के अहंकार को चूर करने वाले और शिव के कपाल व्रत की पूर्णाहुति के गवाह रहे इस मंदिर का आध्यात्मिक महत्व अनूठा है। चाहे आप जीवन में मानसिक अशांति से जूझ रहे हों, ग्रहों के दोषों से पीड़ित हों, या सिर्फ आत्मिक शांति और मोक्ष की तलाश में हों—कपाल भैरव के चरणों में आकर आपका मन पूरी तरह निर्मल हो जाता है।
बाबा महाकाल की इस जादुई नगरी अवंतिका की अगली यात्रा में अष्ट भैरव परिक्रमा के अंतर्गत भगवान कपाली (कपाल भैरव) के दर्शन करना बिल्कुल न भूलें। भगवान भैरवनाथ अपने भक्तों पर सदैव अपनी कृपादृष्टि बनाए रखते हैं।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. भगवान कपाल भैरव का वाहन क्या है और वे अपने हाथ में क्या धारण करते हैं?
उत्तर: तांत्रिक और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान कपाल भैरव का वाहन ‘गज’ (हाथी) है। वे अपने हाथों में मुख्य रूप से त्रिशूल, तलवार, ढाल और ब्रह्मा जी के अहंकार का प्रतीक ‘कपाल’ (नर-खोपड़ी का पात्र) धारण करते हैं।
Q2. उज्जैन में अष्ट भैरव का क्या महत्व है?
उत्तर: स्कंद पुराण के अनुसार, अष्ट भैरव भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन की आठों दिशाओं से रक्षा करने वाले रक्षक देव हैं। कपाल भैरव इन्हीं अष्ट भैरवों में से एक अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप हैं, जो उत्तर-पश्चिम दिशा की रक्षा करते हैं।
Q3. क्या कपाल भैरव की पूजा से मानसिक तनाव और डिप्रेशन दूर होता है?
उत्तर: जी हाँ, चूँकि ‘कपाल’ सीधे तौर पर मनुष्य के मस्तिष्क और बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए मान्यता है कि कपाली भैरव की उपासना करने से मानसिक विकार, अनिद्रा, डिप्रेशन, और अज्ञात भय समूल नष्ट हो जाते हैं।
Q4. कपाल भैरव मंदिर में भगवान को मुख्य रूप से क्या भोग लगाया जाता है?
उत्तर: कपाल भैरव मंदिर में भगवान को मुख्य रूप से चमेली का तेल और सिंदूर का चोला चढ़ाया जाता है। इसके अलावा नारियल, उड़द की दाल के वड़े, इमरती, और मौसमी फलों का सात्विक भोग मुख्य रूप से लगाया जाता है।
Q5. कपाल भैरव मंदिर उज्जैन जाने के लिए सबसे अच्छा मौसम और दिन कौन सा है?
उत्तर: उज्जैन की यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च (सर्दियों का मौसम) सबसे उत्तम माना जाता है। वहीं, कपाल भैरव के विशेष दर्शन के लिए रविवार, मंगलवार और हर महीने आने वाली कालाष्टमी का दिन सबसे फलदायी और विशेष माना गया है।