सनातन धर्म की सात सबसे पवित्र और मोक्षदायिनी पुरियों में अग्रणी ‘अवंतिका नगरी’ (वर्तमान उज्जैन) केवल देवाधिदेव महादेव के दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड में तंत्र, मंत्र, अघोर साधना और योग का सबसे बड़ा जाग्रत केंद्र है। महाकाल वन की इस पावन भूमि के कण-कण में शिव और शक्ति की दिव्य ऊर्जा प्रवाहित होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान महाकाल जहाँ इस संपूर्ण नगरी के राजा और अधिपति हैं, वहीं इस क्षेत्र की सुरक्षा, न्याय और सीमाओं की व्यवस्था का जिम्मा भगवान शिव के ही रौद्र स्वरूप ‘अष्ट भैरव’ (Eight Bhairavas) के हाथों में है।
उज्जैन की रक्षा करने वाले इन अष्ट भैरवों की श्रृंखला में जो सबसे अंतिम, प्रलयंकारी और समस्त पापों व बाधाओं का समूल नाश करने वाला स्वरूप है, उन्हें श्री संहार भैरव (Shri Sanhar Bhairav) के नाम से जाना जाता है। ‘संहार’ शब्द सुनते ही साधारण मनुष्य के मन में विनाश या मृत्यु का भय उत्पन्न हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक और तांत्रिक दृष्टिकोण से संहार भैरव विनाश के नहीं, बल्कि ‘रूपांतरण’ (Transformation), अज्ञान के अंत, प्रारब्ध कर्मों के क्षय और मोक्ष के दाता हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त या साधक जीवन की अत्यंत कठिन परिस्थितियों, असाध्य रोगों या तांत्रिक संकटों से घिर जाता है, वह यदि संहार भैरव के चरणों में आ जाए, तो उसके कष्टों का क्षण भर में संहार हो जाता है।
इस विस्तृत, शोधपूर्ण और संपूर्ण लेख में हम Sanhar Bhairav Temple Ujjain (संहार भैरव मंदिर उज्जैन) के इतिहास, उनके स्वरूप, तांत्रिक रहस्य, ज्योतिषीय महत्व, दर्शन के समय, पूजा विधि और यहाँ की यात्रा से जुड़ी हर एक बारीक जानकारी को गहराई से समझेंगे।
1. श्री संहार भैरव मंदिर: एक संक्षिप्त परिचय (Overview Table)
| जानकारी का क्षेत्र | विवरण |
| मंदिर का नाम | श्री संहार भैरव मंदिर (Shri Sanhar Bhairav Mandir) |
| स्थान | उज्जैन, मध्य प्रदेश (अष्ट भैरव परिक्रमा मार्ग) |
| मुख्य देवता | भगवान संहार भैरव (भगवान शिव का संहारक रुद्रांश) |
| अष्ट भैरव क्रम | तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार अष्ट भैरवों में अंतिम/विशिष्ट स्थान |
| वाहन (Vehicle) | श्वान (कुत्ता / Dog) या कहीं-कहीं प्रेत/भूत |
| शक्ति/सहचरी देवी | माता चंडी / भैरवी (Maa Chandi / Bhairavi) |
| दिशा के स्वामी | उत्तर-पूर्व दिशा (Ishanya Kona – North-East) / केंद्र बिंदु |
| दर्शन का समय | सुबह 06:00 बजे से रात 09:00 बजे तक |
| मुख्य भोग/चढ़ावा | सिंदूर, सरसों का तेल, काले तिल, उड़द के वड़े, नींबू, और शराब (मदिरा) |
| विशेष पूजा लाभ | प्रारब्ध कर्मों का नाश, असाध्य रोगों से मुक्ति, अकाल मृत्यु के भय का संहार |
2. भगवान संहार भैरव कौन हैं? (Who is Lord Sanhar Bhairav?)
भगवान शिव के उग्र, प्रलयंकारी और भक्तों को अभय दान देने वाले स्वरूप को ‘भैरव’ कहा जाता है। तंत्र शास्त्रों (जैसे विज्ञान भैरव तंत्र, रुद्रयामल तंत्र और शिव महापुराण) के अनुसार, भैरव के 8 मुख्य स्वरूप हैं जिन्हें सम्मिलित रूप से अष्ट भैरव कहा जाता है। इन अष्ट भैरवों में अंतिम और सबसे शक्तिशाली संहारक शक्ति के रूप में ‘संहार भैरव’ प्रतिष्ठित हैं।
‘संहार’ शब्द का तांत्रिक और आध्यात्मिक अर्थ
सृष्टि का एक शाश्वत नियम है— जो उत्पन्न हुआ है, उसका अंत निश्चित है। भगवान शिव के तीन मुख्य कार्य हैं: सृष्टि का निर्माण (ब्रह्मा रूप), सृष्टि का पालन (विष्णु रूप) और सृष्टि का संहार (रुद्र रूप)।
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नकारात्मकता का संहार: संहार भैरव केवल भौतिक जगत का संहार नहीं करते, बल्कि वे मनुष्य के भीतर छिपे काम, क्रोध, मद, लोह, मोह और अहंकार जैसी आसुरी प्रवृत्तियों का संहार करते हैं।
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कर्मों के जाल से मुक्ति: मनुष्य अपने कई जन्मों के कर्मों के जाल (Karmic Debt) में फंसा रहता है। संहार भैरव अपने साधक के उन बुरे प्रारब्ध कर्मों को भस्म कर देते हैं, जिससे जीव को बार-बार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
संहार भैरव का शास्त्रीय स्वरूप
तांत्रिक ग्रंथों (जैसे ‘शैव आगम’ और ‘भैरव तंत्र’) के अनुसार, संहार भैरव का स्वरूप अत्यंत भयंकर और साथ ही परम कल्याणकारी है:
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वर्ण (Complexion): इनका शरीर बिजली के समान चमकीला, ताम्र वर्ण (तांबे जैसा लाल) या गहरा श्याम वर्ण का होता है, जो ब्रह्मांड की संहारक अग्नि का प्रतीक है।
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अस्त्र-शस्त्र: वे अपनी आठ या दस भुजाओं में मुख्य रूप से त्रिशूल, खड्ग (तलवार), परशु (कुल्हाड़ी), डमरू, कपाल और ढाल धारण करते हैं। उनके गले में मुंडों की माला सुशोभित होती है।
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वाहन: संहार भैरव का मुख्य वाहन ‘श्वान’ (कुत्ता) है, जो यमराज का दूत और अत्यंत वफादार व सजग जीव माना जाता है। कहीं-कहीं उच्च तांत्रिक साधनाओं में उन्हें मानव शव या प्रेत पर आसीन भी दिखाया जाता है, जो मृत्यु पर विजय का प्रतीक है।
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शक्ति: इनकी दिव्य सहचरी ‘माता चंडी’ या ‘चंडा भैरवी’ हैं, जो संहार की अधिष्ठात्री देवी हैं और साधक को परम शक्ति प्रदान करती हैं।
3. संहार भैरव मंदिर का पौराणिक इतिहास (Mythological History of Sanhar Bhairav)
उज्जैन के संहार भैरव मंदिर का इतिहास सतयुग और स्कंद पुराण के ‘अवंत्य खंड’ से जुड़ा हुआ है। उज्जैन की पावन भूमि पर इनके स्थापित होने के पीछे एक अत्यंत विस्मयकारी कथा मिलती है।
ब्रह्मा के अहंकार का अंत और भैरव का अवतरण
पौराणिक कथा के अनुसार, जब सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी को अपनी रचना पर अत्यधिक घमंड हो गया और उन्होंने स्वयं को भगवान शिव से भी श्रेष्ठ मान लिया, तब शिव के अंश से परम प्रलयंकारी ‘काल भैरव’ प्रकट हुए। काल भैरव ने ब्रह्मा जी के उस अहंकारी पांचवें सिर को काट दिया। इस घटना के बाद, जब ब्रह्मांड में अधर्म और आसुरी शक्तियों का आतंक बढ़ने लगा, तो भगवान शिव ने अपनी संहारक शक्ति को आठ भागों में विभाजित किया, ताकि वे चराचर जगत की रक्षा कर सकें।
जब पृथ्वी पर महाकाल वन (उवंतिका/उज्जैन) की स्थापना हुई, तब भगवान शिव ने निर्णय लिया कि इस मोक्ष नगरी में आने वाले किसी भी पापी जीव को तब तक पूर्ण मोक्ष नहीं मिल सकता, जब तक उसके पापों का पूरी तरह से संहार न हो जाए। इसके लिए भगवान शिव स्वयं यहाँ ‘संहार भैरव’ के रूप में स्थापित हुए।
[ब्रह्मांड में अधर्म का उदय] ──> [शिव की संहारक शक्ति का विभाजन] ──> [उज्जैन महाकाल वन का चयन] ──> [संहार भैरव का प्राकट्य और स्थापना]
राजा विक्रमादित्य और संहार भैरव
उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के इतिहास में भी संहार भैरव का अप्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है। राजा विक्रमादित्य तंत्र शास्त्र के प्रकांड ज्ञाता थे और वे अपने जीवन के बड़े संकटों और युद्धों में विजय प्राप्त करने के लिए अष्ट भैरव की गुप्त आराधना करते थे। माना जाता है कि शत्रुओं के पूर्ण विनाश और राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए सम्राट विक्रमादित्य ने संहार भैरव के मंदिर में कई विशेष तांत्रिक अनुष्ठान करवाए थे।
4. उज्जैन में अष्ट भैरव परंपरा और संहार भैरव का महत्व (Ashta Bhairav Network)
उज्जैन नगरी की भौगोलिक और आध्यात्मिक बनावट इस प्रकार है कि इसके चारों कोनों और मध्य की दिशाओं को अष्ट भैरवों द्वारा सुरक्षित किया गया है। इन्हें उज्जैन का ‘सुरक्षा चक्र’ या ‘तांत्रिक किला’ भी कहा जा सकता है।
उज्जैन के अष्ट भैरव इस प्रकार हैं:
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श्री काल भैरव (नगर कोतवाल)
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श्री असितांग भैरव
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श्री रुरु भैरव
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श्री चंड भैरव
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श्री क्रोध भैरव
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श्री उन्मत्त भैरव
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श्री कपाली (कपाल) भैरव
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श्री संहार भैरव
संहार भैरव इस पूरी व्यवस्था के अंतिम बिंदु हैं। तंत्र मार्ग में ऐसी मान्यता है कि यदि कोई साधक अष्ट भैरव की यात्रा करता है, तो जब तक वह अंतिम रूप से संहार भैरव के दरबार में आकर अपनी साधना को समर्पित नहीं करता, तब तक उसकी अष्ट भैरव यात्रा और उसका पुण्य फल अधूरा ही माना जाता है। संहार भैरव ही साधक की साधना के सभी अवरोधों का संहार करके उसे पूर्णता प्रदान करते हैं।
5. मंदिर की वास्तुकला और परिवेश (Architecture & Environment)
उज्जैन का संहार भैरव मंदिर आधुनिक चकाचौंध से दूर, एक शांत, एकांत और अत्यधिक ऊर्जायुक्त स्थान पर स्थित है। यह मंदिर उन लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है जो भीड़भाड़ से दूर एकांत में बैठकर ध्यान लगाना चाहते हैं।
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प्राचीनता के अवशेष: मंदिर के गर्भगृह और मुख्य ढांचे में मालवा शैली की प्राचीन वास्तुकला की झलक मिलती है। समय-समय पर स्थानीय भक्तों और पुजारियों द्वारा इसका जीर्णोद्धार किया गया है।
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दिव्य विग्रह (Idol): मंदिर के भीतर भगवान संहार भैरव की दिव्य और रौद्र प्रतिमा स्थापित है। भगवान के नेत्र बड़े और तीक्ष्ण हैं, जो भक्त के भीतर छिपी हर दुर्भावना को देख लेते हैं। मूर्ति पर लगातार सिंदूर, चमेली का तेल और घी चढ़ाने की परंपरा है, जिसके कारण प्रतिमा का तेज देखते ही बनता है।
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रहस्यमयी वातावरण: चूंकि यह भैरव देव का संहारक रूप है, इसलिए मंदिर के परिवेश में एक गंभीर और शांत तांत्रिक ऊर्जा (Mystical Vibes) महसूस होती है। मंदिर के पास लगे पुराने वृक्ष और शिप्रा नदी से आने वाली ठंडी हवाएं यहाँ के वातावरण को और अधिक अलौकिक बना देती हैं।
6. आध्यात्मिक, तांत्रिक और ज्योतिषीय महत्व (Significance)
वैदिक ज्योतिष, पुराणों और तंत्र शास्त्र में संहार भैरव की उपासना को जीवन के सबसे अंधकारमय समय से बाहर निकलने का अचूक मार्ग बताया गया है।
1. असाध्य रोगों और अकाल मृत्यु (Akaal Mrityu) से रक्षा
संहार भैरव को काल का भी काल माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर, लंबे और असाध्य रोग (Terminal Illness) से पीड़ित है और दवाओं का असर नहीं हो रहा है, तो संहार भैरव के नाम से महामृत्युंजय पाठ या महाभैरव अनुष्ठान कराने से रोग का संहार होता है। यह अकाल मृत्यु के योग को भी टालने की क्षमता रखता है।
2. राहु, केतु और शनि के महादोषों का निवारण
ज्योतिष शास्त्र में भगवान भैरव को क्रूर और पापी ग्रहों का परम नियंत्रक माना गया है। जिन जातकों की कुंडली में राहु की महादशा, केतु का अंतर्दशा, या शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या के कारण जीवन नर्क के समान हो गया हो, व्यापार ठप हो गया हो या घर में लगातार दुर्घटनाएं हो रही हों, उन्हें संहार भैरव की शरण में अवश्य आना चाहिए। शनिवार के दिन यहाँ तेल का दीपक जलाने से इन ग्रहों की पीड़ा तुरंत शांत होती है।
3. गुप्त शत्रुओं और तंत्र बाधा (Black Magic) का समूल नाश
व्यापार या राजनीति में जब गुप्त शत्रु आपके जीवन और करियर को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हों, या किसी ने आपके परिवार पर तंत्र प्रयोग (अभिचार कर्म या काला जादू) कर दिया हो, तो संहार भैरव की उग्र ऊर्जा उस पूरे तांत्रिक प्रयोग को उलट देती है और शत्रुओं के षड्यंत्रों का संहार कर देती है।
7. भगवान संहार भैरव पूजा विधि और दिव्य मंत्र (Worship Rules & Mantras)
संहार भैरव मंदिर में आम भक्तों के लिए अत्यंत सात्विक और राजसिक पूजा विधि प्रचलित है, जबकि अघोर और नाथ संप्रदाय के साधक यहाँ गुप्त रातों में अपनी तांत्रिक पद्धतियों से पूजा करते हैं।
गृहस्थों के लिए सरल पूजा विधि:
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स्नान और मानसिक तैयारी: सुबह या शाम को स्नान करके साफ कपड़े पहनें। भैरव पूजा के लिए काले, नीले या लाल वस्त्र सर्वोत्तम माने जाते हैं।
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दीपक और धूप: भगवान के सम्मुख सरसों के तेल या तिल के तेल का एक दीपक प्रज्वलित करें। धूपबत्ती सुलगाएं।
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सामग्री अर्पण: भगवान को चमेली का तेल और सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाएँ। इसके बाद काले तिल, साबुत उड़द, नींबू की माला और लाल फूल अर्पित करें।
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विशेष भोग: संहार भैरव जी को नैवेद्य के रूप में उड़द की दाल के बड़े, इमरती, बेसन के लड्डू और ऋतु फल चढ़ाए जाते हैं। कुछ विशेष मन्नत पूरी होने पर यहाँ परंपरा के अनुसार सात्विक रूप से मदिरा का भोग भी लगाया जाता है।
परम चमत्कारी मंत्र: मंदिर के प्रांगण में बैठकर शांत मन से इस मंत्र का 108 बार (एक माला) जाप करने से हर संकट टल जाता है:
ॐ ह्रीं संहार भैरवाय नमःशत्रुओं से अत्यधिक पीड़ित होने पर इस मंत्र का संपुट के साथ जाप किया जाता है:
ॐ भं भैरवाय शत्रूणाम् संहाराय फट स्वाहा।
8. मंदिर के दर्शन का समय और आरती की समय-सारिणी (Timings Table)
संहार भैरव मंदिर उज्जैन में दर्शन के लिए पट सुबह जल्दी खुल जाते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए समय-सारिणी नीचे दी गई है:
| दिन का प्रहर | खुलने का समय | बंद होने का समय | विशेष विवरण |
| प्रातः कालीन दर्शन (Morning) | सुबह 06:00 बजे | दोपहर 01:00 बजे | इस समय भगवान का अभिषेक, श्रृंगार और प्रातः कालीन आरती संपन्न होती है। |
| मध्याह्न विश्राम (Afternoon) | दोपहर 01:00 बजे | दोपहर 04:00 बजे | दोपहर के समय भगवान के विश्राम के लिए कपाट बंद किए जा सकते हैं। |
| सायं काल और रात्रि दर्शन (Evening) | दोपहर 04:00 बजे | रात 09:00 बजे | संध्या आरती और दीपदान के लिए यह समय सबसे जागृत और उपयुक्त माना जाता है। |
विशेष नोट: प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कालाष्टमी), रविवार और मंगलवार के दिन मंदिर बिना किसी मध्याह्न विश्राम के लगातार खुला रह सकता है, क्योंकि इन दिनों भक्तों की संख्या बहुत अधिक होती है।
9. मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहार और उत्सव (Major Festivals)
संहार भैरव मंदिर में साल के कुछ विशेष दिनों में अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है, और इन दिनों दर्शन करने का पुण्य फल अनंत गुना बढ़ जाता है।
1. महाभैरव जयंती (Bhairav Ashtami)
मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान भैरव का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन संहार भैरव मंदिर को विशेष रूप से दीपों और फूलों से सजाया जाता है। मध्यरात्रि में (चूंकि भैरव देव रात्रि के स्वामी हैं) महा-अभिषेक, तांत्रिक हवन और भंडारे का आयोजन किया जाता है।
2. महाशिवरात्रि
चूँकि संहार भैरव देवाधिदेव महादेव के ही अवतार हैं, इसलिए महाशिवरात्रि के दिन यहाँ का उत्साह देखते ही बनता है। इस पावन पर्व पर हज़ारों श्रद्धालु महाकाल के दर्शन के बाद अष्ट भैरवों के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं। रात भर चार प्रहर की विशेष पूजा चलती है।
3. गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri)
साल में आने वाली दो गुप्त नवरात्रों (माघ और आषाढ़ मास) के दौरान यह मंदिर तांत्रिकों, अघोरियों और शाक्त साधकों का मुख्य केंद्र बन जाता है। इन नौ दिनों में माता चंडी और भगवान संहार भैरव की संयुक्त गुप्त साधनाएं की जाती हैं।
10. श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण नियम और सावधानियां (Do’s and Don’ts)
एक अत्यंत जाग्रत और उग्र पीठ होने के कारण, संहार भैरव मंदिर परिसर के भीतर श्रद्धालुओं को कुछ नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:
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पवित्रता का नियम: मंदिर में प्रवेश करने से पहले हाथ-पैर अच्छी तरह धो लें या स्नान करके ही जाएँ। अपवित्र अवस्था में मंदिर की वेदियों को न छुएं।
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मर्यादित परिधान: पाश्चात्य और छोटे कपड़े (जैसे शॉर्ट्स, बरमूडा या अमर्यादित वस्त्र) पहनकर मंदिर में प्रवेश वर्जित है। भारतीय पारंपरिक परिधान (धोती-कुर्ता, साड़ी या सलवार-सूट) ही धारण करें।
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मौन और संयम: मंदिर के भीतर ज़ोर से चिल्लाना, हँसना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना सख्त मना है। यह संहारक ऊर्जा का स्थान है, अतः मन को शांत और अंतर्मुखी रखें।
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चमड़े की वस्तुएं बाहर रखें: चमड़े का बेल्ट, पर्स, जूते-चप्पल या जैकेट मंदिर के गर्भगृह के भीतर ले जाना वर्जित है।
11. उज्जैन स्थित संहार भैरव मंदिर कैसे पहुँचें? (How to Reach)
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित उज्जैन शहर पूरे भारत से रेल, सड़क और वायु मार्ग द्वारा बहुत ही सुगमता से जुड़ा हुआ है।
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हवाई मार्ग द्वारा (By Air): उज्जैन का अपना कोई कमर्शियल हवाई अड्डा नहीं है। सबसे पास का हवाई अड्डा ‘देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, इंदौर’ (Indore Airport) है, जो उज्जैन से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इंदौर एयरपोर्ट से आप आसानी से ओला, उबर, प्राइवेट टैक्सी या बस लेकर 1 से 1.5 घंटे में उज्जैन पहुँच सकते हैं।
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रेल मार्ग द्वारा (By Train): ‘उज्जैन जंक्शन’ (UJN) देश का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है। यहाँ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, जयपुर और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से सीधी सुपरफास्ट और एक्सप्रेस ट्रेनें चौबीसों घंटे आती हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 6-7 किलोमीटर है।
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सड़क मार्ग द्वारा (By Road): उज्जैन भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और कोटा जैसे शहरों से फोर-लेन हाईवे द्वारा जुड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश राज्य परिवहन और निजी ऑपरेटरों की लक्ज़री बसें (Volvo AC) नियमित रूप से उपलब्ध हैं।
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स्थानीय परिवहन (Local Commute): उज्जैन रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से मंदिर पहुँचने के लिए सबसे अच्छा और सस्ता साधन ई-रिक्शा या ऑटो-रिक्शा है। आप स्थानीय चालकों से ‘अष्ट भैरव मार्ग पर स्थित संहार भैरव मंदिर’ चलने के लिए कह सकते हैं।
12. संहार भैरव मंदिर के आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल (Nearby Attractions)
यदि आप संहार भैरव मंदिर के दर्शन के लिए आ रहे हैं, तो अपनी उज्जैन यात्रा को पूर्ण बनाने के लिए इन प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन भी अवश्य करें:
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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: विश्व प्रसिद्ध दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग, जहाँ की भस्म आरती और महाकाल लोक (Mahakal Lok) पूरे विश्व में आकर्षण का केंद्र हैं।
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श्री काल भैरव मंदिर: उज्जैन के अष्ट भैरवों के प्रधान और नगर के कोतवाल, जहाँ भगवान साक्षात मदिरा का पान करते हैं।
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श्री विक्रांत भैरव मंदिर: शिप्रा नदी के तट पर ओखलेश्वर श्मशान के समीप स्थित एक और महा-जाग्रत और उग्र तांत्रिक पीठ।
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हरसिद्धि माता शक्तिपीठ: भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक, जहाँ माता सती की कोहनी गिरी थी। यहाँ शाम के समय जलने वाले दीप स्तंभ अत्यंत मनमोहक होते हैं।
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मंगलनाथ मंदिर: इस स्थान को पुराणों में पृथ्वी का केंद्र (नाभि स्थान) माना गया है। यहाँ मंगल ग्रह की शांति के लिए भात पूजा कराई जाती है।
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सिद्धवट: शिप्रा नदी के घाट पर स्थित एक प्राचीन वटवृक्ष, जिसका धार्मिक महत्व गया जी के समान पितृ तर्पण के लिए माना गया है।
उज्जैन का श्री संहार भैरव मंदिर केवल पत्थरों की एक प्राचीन इमारत नहीं है, बल्कि यह अनंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वह महा-स्रोत है जो मनुष्य के जीवन से अंधकार, पाप और दुखों का संहार करता है। संहार भैरव की उपासना हमें यह सिखाती है कि जीवन में नई और सुंदर शुरुआत के लिए पुरानी और सड़ चुकी चीजों (जैसे अहंकार, अज्ञान और बुरी आदतें) का संहार होना अत्यंत आवश्यक है।
चाहे आप नवग्रहों की क्रूर दशाओं से पीड़ित हों, अदालती मामलों से परेशान हों, या अपनी आध्यात्मिक यात्रा को उच्च स्तर पर ले जाना चाहते हों— संहार भैरव के चरणों में आकर आपकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। बाबा महाकाल की इस जादुई नगरी अवंतिका की अपनी अगली यात्रा में अष्ट भैरव परिक्रमा के इस अंतिम और परम कल्याणकारी स्वरूप के दर्शन करना बिल्कुल न भूलें।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. भगवान संहार भैरव कौन हैं और अष्ट भैरव में उनका क्या स्थान है?
उत्तर: भगवान संहार भैरव भगवान शिव के ही उग्र और प्रलयंकारी रुद्रांश हैं। तंत्र शास्त्र और पुराणों के अनुसार, उज्जैन की रक्षा करने वाले आठ मुख्य भैरवों (अष्ट भैरव) की श्रृंखला में संहार भैरव को अंतिम और सबसे शक्तिशाली संहारक शक्ति के रूप में पूजा जाता है।
Q2. संहार भैरव का वाहन और उनकी दिव्य शक्ति (सहचरी) कौन हैं?
उत्तर: भगवान संहार भैरव का मुख्य वाहन ‘श्वान’ (कुत्ता) है, और कुछ गुप्त तांत्रिक चित्रों में उन्हें प्रेत या शव पर आसीन भी दिखाया गया है। इनकी दिव्य सहचरी (शक्ति) माता चंडी या चंडा भैरवी हैं।
Q3. संहार भैरव मंदिर में पूजा करने से भक्तों को क्या विशेष लाभ मिलता है?
उत्तर: संहार भैरव की पूजा करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पापों और बुरे प्रारब्ध कर्मों का संहार होता है। इसके अलावा असाध्य रोगों से मुक्ति, अकाल मृत्यु के भय का नाश, गुप्त शत्रुओं पर विजय और राहु-केतु व शनि के महादोषों से मुक्ति मिलती है।
Q4. क्या संहार भैरव मंदिर में मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है?
उत्तर: हाँ, उज्जैन की तांत्रिक और कापालिक परंपराओं के अनुसार, अष्ट भैरव के कई रूपों की तरह संहार भैरव को भी मन्नत पूरी होने पर या विशेष तिथियों पर मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है। इसके साथ ही उड़द के वड़े और सिंदूर का चोला भी मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है।
Q5. Sanhar Bhairav Temple Ujjain जाने के लिए सबसे अच्छा दिन और समय कौन सा है?
उत्तर: भगवान संहार भैरव के दर्शन के लिए सप्ताह में रविवार और मंगलवार का दिन सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त, हर महीने आने वाली कालाष्टमी और मार्गशीर्ष मास की भैरव अष्टमी के दिन दर्शन करना सर्वोत्तम फल देता है। दर्शन के लिए शाम का समय (प्रदोष काल) सबसे जाग्रत माना गया है।